Wednesday, February 1, 2012

मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है

खुदा इस शहर को महफूज़ रखे
ये बचों की तरह हँसता बहुत है

मैं तुझसे रोज़ मिलता चाहता हूँ
मगर इस राह में ख़तरा बहुत है

मेरा दिल बारिशों में फूल जैसा
ये बच्चा रात में रोता बहुत है

 इसे आंसू का एक कतरा न समझो
कुयाँ है और ये  गहरा बहुत है

उसे शोहरत ने तनहा कर दिया है
समंदर है मगर प्यासा बहुत है..

मैं एक लम्हें में सदियाँ देखती हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है

मेरा हँसना ज़रुरी हो गया है
यहाँ हर शख्स अकेला बहुत है 
---बशीर बद्र

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