Saturday, October 5, 2013

शुरू करूँ तेरी आँखों से फ़साना तेरा,तेरी आँखों में कितनी ही पहेलियाँ बंद हैं..!!
भटकते फिरते हैं माज़ी के साए खंडर में,तेरी आँखों में कितनी ही हवेलियाँ बंद हैं..
(माज़ी-past)
-Tabish Naqvi

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