Thursday, October 17, 2013

Agli galati ki shuruaat - Kumar Vikal /अगली ग़लती की शुरुआत --- (कुमार विकल)

ग़लती की शुरुआत यहीं से होती है
जब तुम उनके नज़दीक जाते हो
और कबाड़ी से ख़रीदे अपने कोट को
किसी विदेशी दोस्त का भेजा हुआ तोहफ़ा बतलाते हो.
लेकिन वे बहुत शातिर हैं
तुम्हारे कोट की असलियत को पहचानते हैं
वे सिर्फ़ चाहते हैं
कि तुम उसी तरह अपनी असलियत को छिपाते जाओ
और कभी कपड़े उतार कर नंगे न हो जाओ.
वे नंगे आदमी से बहुत डरते हैं
क्योंकि नंगा आदमी बहुत ख़तरनाक होता है.
इसलिए वे तुम्हारी ओर—
दोस्ती के दस्तानों वाले अपने पंजे बढ़ाते है
और तुम—
दोस्ती के लालच में उनके पंजों के नाखूनों को नज़रअंदाज़ कर देते हो
क्योंकि उस वक़्त तुम्हारी नज़रें
डाक्टर लाल के बंगले के आमों पर होती हैं
और त्रिपाठी जी के नाश्ते के बादामों पर होती हैं
और वे कुटिलता से मुस्कुरा रहे होते हैं
कि तुम्हारी आँखों में लालच है
और मुँह में पानी है
वे जानते है,कमज़ोर आदमी की यही निशानी है.
वे जानते हैं तुम्हारी क़ीमत थोड़ी —सी शराब है
और एक टुकड़ा क़बाब है;
कि तुम्हें उनकी गाड़ियाँ अच्छी लगती हैं
कि उनकी बीवियों की साड़ियाँ अच्छी लगती हैं
कि तुम अपना ग़ुस्सा कविता में उतार कर ठंडे हो जाओगे
लेकिन ज़िंदगी में कभी नंगे नहीं हो पाओगे
यहाँ तक कि अपने जिस्म की खरोंचें भी छिपाओगे.
इसी लिए मौक़ा लगते ही वे
अपने पंजों से दोस्ती के दस्ताने उतार कर
तेज़ नाखून तुम्हारे जिस्म में गाड़ देते हैं.
और उस रात
जब तुम हताश होकर
अपने बिस्तर में छटपटाते हो
तो बूढ़े पिता की याद कर के बहुत रोते हो
तुमें अपने मज़दूर भाई की बहुत याद आती है
और गाँव —घर की बातें बहुत सताती हैं.
उस घड़ी तुम
आँसुओं की कमज़ोर भाषा में
कुछ मज़बूत फ़ैसले करते हो
और अपनी कायरता के नर्म तकिए में
मुँह रख कर सो जाते हो.
अगली ग़लती की शुरुआत
यहीं से होती है.
____कुमार विकल

Sunday, October 13, 2013

तन्हाईयां कुछ इस तरह से डसने लगी मुझे
मैं आज अपने पाओं की आहट से डर गया ..
या तो उनका तज़करा करे हर कोई
या कोई हमसे गुफ़्तगु न करे ..
अजीब तिल्लसुम है तेरे वजूद का मुझ पर
टूटा मेरा हर ख़्वाब,मगर ये नहीं टूटा..
मेरा कारनामा-ए-ज़िन्दगी मेरी हसरतों के सिवा कुछ नहीं
ये किया नहीं,वो हुआ नहीं,ये मिला नहीं,वो रहा नहीं ..
वो शख्स जिस को समझने में मुझको उम्र लगी 
बिछुड़ के मुझसे किसी का न हो सका होगा .. मोहसिन नक़वी
बदलते मौसमों की सैर में 
दिल को लगाना हो 
किसी को याद रखना हो 
किसी को भूल जाना हो 
हमेशा देर कर देता हूँ मैं.... 

किसी को मौत से पहले 
किसी ग़म से बचाना हो 
हकीक़त कुछ और थी 
उस को जा के ये बताना हो 
हमेशा देर कर देता हूँ मैं... Munir Niazi
मत माँग दुआएं जब
मोहब्बत तेरा मेरा मसला है ...

Wednesday, October 9, 2013

लोग पूछते हैं कि कौन है वो जो तेरी ये हालत कर गया 
मैं मुस्कुरा के कहता हूँ उस का नाम हर किसी के लब पे अच्छा नहीं लगता ... अज्ञात 
log poochte hain k kaun hai wo jo teri ye halat ker gaya ....?
maiN muskura ke kehta hun us ka naam her kisi k lab pe acha nahi lagta.. Unknown
कहते हैं लोग मुझसे कोई और बात कर 
लाऊं कहाँ से बात, तेरी बात के सिवा.. Unknown
अब भी न हो कबूल ये नसीब की बात है 
जिन्हें ख़ुदा है माना, वो आमीन कह रहे हैं मेरी दुआ के साथ ...Gaganjagjit Singh

Ab bhi na ho kabool ye naseeb ki baat hai
Jinhe khuda hai mana, wo amin keh rahe hai meri dua k sath....
बड़ा गहरा ताल्लुक है सियासत का तबाही से,
जब कोई शहर जलता है तो दिल्ली मुस्कुराती है... Unknown
सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी हैं हज़ारों बातें
मै तेरा हुस्न तेरे हुस्न-ए-बयां तक देखूँ....
-अहमद नदीम कासमी
इनकार ही कर दीजिये इक़रार नहीं तो 
उलझन ही में मर जाएगा बीमार नहीं तो..
फिर उसी का ख़याल आया है
वो जो अपना नहीं पराया है.. Unknown
लोग पूछते हैं कि कौन है वो जो तेरी ये हालत कर गया 
मैं मुस्कुरा के कहता हूँ उस का नाम हर किसी के लब पे अच्छा नहीं लगता ... अज्ञात

Sunday, October 6, 2013

फले फूलेगी कैसे ये गूंगी मुहब्बत 
ना तुम बोलते हो ना हम बोलते है.. Unknown
अब भी न हो कबूल ये नसीब की बात है 
जिन्हें ख़ुदा है माना, वो आमीन कह रहे हैं मेरी दुआ के साथ ...Unknown

Ab bhi na ho kabool ye naseeb ki baat hai
Jinhe khuda hai mana, wo amin keh rahe hai meri dua k sath....

Saturday, October 5, 2013

खिड़की चाँद किताब और मैं
मुद्दत से इक बाब और मैं 
शब् भर खेलें आपस में 
दो ऑंखें इक ख़ाब और मैं 
मौज और कश्ती साहिल पर 
दरिया में गर्दाब और मैं 
शाम , उदासी, ख़ामोशी 
कुछ कंकर तालाब और मैं ..
हर शब् पकड़े जाते हैं 
गहरी नींद, तेरे ख़ाब और मैं ...फ़ैसल 
(*बाब- सागर , शब्- रात , गर्दाब-लहरें )
तूने पूछा है मगर कैसे बताएं तुझ को 
दुःख इबारत तो नहीं कि तुझे लिख भेजें .. अज्ञात
मोहब्बत गोलीओं से बो रहे हो 
वतन का चेहरा खून से धो रहे हो 
गुमान तुम को है कि रास्ता कट रहा है 
यकीन है मुझको कि मंज़िल खो रहे हो ... जालिब
चली आई न जाने नींद कैसे 
तुम्हारी याद को क्या हो गया है

jab bhi is shehar se... Gopal Das Neeraj

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला,
मेरे स्वागत को हर एक जेब से खंजर निकला ।

तितलियों फूलों का लगता था जहाँ पर मेला,
प्यार का गाँव वो बारूद का दफ़्तर निकला ।

डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर, 
एक आँसू का वो कतरा तो समुंदर निकला ।

मेरे होठों पे दुआ उसकी जुबाँ पे ग़ाली,
जिसके अन्दर जो छुपा था वही बाहर निकला ।

ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा,
मेरा सब रूप वो मिट्टी की धरोहर निकला ।

वो तेरे द्वार पे हर रोज़ ही आया लेकिन,
नींद टूटी तेरी जब हाथ से अवसर निकला ।

रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिसने खाई,
वो भिखारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला ।

क्या अजब है इंसान का दिल भी 'नीरज'
मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला ...- Gopaldas Neeraj
ਇੱਕ ਬੁੱਤ ਤੇਰਾ ਏ .. ਇੱਕ ਬੁੱਤ ਮੇਰਾ ਏ ..!!
ਆ ਤੋੜ ਕੇ ਦੋਨਾਂ ਨੂੰ ਮਿੱਟੀ 'ਚ ਮਿਲਾ ਦੇਈਏ !!
ਫੇਰ ਉਸੇ ਮਿੱਟੀ ਦੇ ਦੋ ਨਵੇਂ ਬੁੱਤ ਬਣਾ ਲਈਏ ...
ਤੇਰੇ ਬੁੱਤ 'ਚ ਮੈਂ ਹੋਵਾਂ...!
ਤੇ ਮੇਰੇ ਬੁੱਤ 'ਚ ਤੂੰ ਹੋਵੇਂ..!! 
conceived by- Harinderpal Singh
Written By- Jassi Sangha
शुरू करूँ तेरी आँखों से फ़साना तेरा,तेरी आँखों में कितनी ही पहेलियाँ बंद हैं..!!
भटकते फिरते हैं माज़ी के साए खंडर में,तेरी आँखों में कितनी ही हवेलियाँ बंद हैं..
(माज़ी-past)
-Tabish Naqvi
ਮੈਂ ਖੁਸ਼ਕ ਪੱਤਿਆਂ ਨਾਲ ਜਿਸਮ ਢਕੀ ਆਦਿ-ਵਾਸੀ ਕੁੜੀ ਸਾਂ ਕੋਈ,
ਤੇਰੀ ਆਵਾਰਾ ਨਜ਼ਰ ਬਸ,ਪੱਤ-ਝੱੜ ਉਡੀਕਦੀ ਰਹੀ..
यदि सीता के साथ दो बार
चार फौजी और दो पुलिसिए
एक एक बार बलात्कार करते हैं
तो देश की सुरक्षा दीवार
कितनी ऊंची हो जाएगी
दीवार की ऊंचाई फीट में बताइए?

यदि सोनी सोरी के गुप्तांग में
आठ मोमबत्तियां, छह पेंसिलें
और आधा किलो पत्थर
घुसा दिया जाए
तो कप्तानों को मिलने वाले
वीरता पदकों की संख्या बताइए?

यदि 9 साल के बच्चे को
उसकी मां के सामने
गोलियों से भून दिया जाए
और छह महीने के भ्रूण को
पेट फाड़कर तलवार पर
टांग लिया जाए
तो इस वीरता में
राजधर्म का प्रतिशत बताइए?

यदि शीतल साठे नाम की
कोई एक गर्भवती स्त्री
जेल में बच्चे को जन्म देती है
तो बताइए नवजात बच्चा
गुलाम देश का नागरिक
या कि स्वतंत्र देश का
नागरिक माना जाएगा?

कल्पना कीजिए
यदि आपके देश के
प्रति गांव
एक-एक भगत सिंह है
तो अमेरिका आपके देश को
किस श्रेणी में रखेगा?
विकल्प है -
1. राष्ट्रवादी देश
2. समाजवादी देश
3. धार्मिक देश
4. आतंकवादी देश

(कवि अष्टभुजा शुक्ल की कविता से प्रेरित)
उस के जैसे हज़ारों चेहरे हैं मेरे सामने
दिल की ज़िद्द है कि वो नहीं तो उस जैसा भी नहीं ..unknown

Us ke jaise hzaaroN chehre hain mere saamne
dil ki zid hai ki woh nhin toh us jaisa bhi nhiN.. Unknown
ਤੂੰ ਤਾਕਤ ਏਂ ਪਤਾ ਸੀ , ਤੂੰ ਕਮਜ਼ੋਰੀ ਏਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਤਾ
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਏਂ ਪਤਾ ਸੀ , ਮੈਂ ਤੇਰੀ ਹਾਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਤਾ ...ਜੱਸੀ ਸੰਘਾ
ਚੜ੍ਹਦੇ ਸੂਰਜਾਂ ਨੂੰ ਸਲਾਮ ਕਰਨਾ
ਸਾਡੀ ਫਿਤਰਤ ਨਹੀਂ
ਉਹ ਹੋਰ ਹੀ ਹਨ
ਜੋ ਪਹਿਲੀ ਕਿਰਨ ਦੀ
ਝਲਕ ਪੈਂਦੇ ਹੀ
ਪਾਣੀ ਦੇ ਲੋਟੇ ਲੈ ਕੇ
ਦੌੜਦੇ ਨੇਂ,
ਤੇ ਕਾਮਨਾ ਕਰਦੇ ਨੇਂ
ਕਿਸੇ ਮਿਹਰ ਦੀ |
ਪਰ
ਅਸੀਂ ਉਹ ਧੁਰੇ ਹਾਂ
ਜੋ ਆਪਣੀ ਜਗ੍ਹਾ ਤੋਂ
ਕਦੇ ਹਿੱਲੇ ਨਹੀਂ
ਕਿਸੇ ਸੂਰਜ ਦੀ ਮਰਜ਼ੀ ਹੈ
ਉਹ ਗੇੜੇ ਕੱਟ ਸਕਦਾ ਹੈ
-ਗਜਿੰਦਰ ਸਿੰਘ
शिद्दत-ए-दर्द से शर्मिन्दा नहीं मेरी वफ़ा,
प्यार गहरा है तो ज़ख़्म भी गहरा ही होगा..अज्ञात
मोहब्बत के बाद मोहब्बत मुमकिन है,
पर टूट के चाहना सिर्फ़ एक बार होता है ... अज्ञात
छोड़ जाते हो और फिर याद करते हो,
क्यू हमेशा मुजे बर्बाद करते हो
@ramta
ਅਲਿਫ਼ -ਇਹ ਤਨ ਚਸ਼ਮਾ ਹੋਵੇ,ਮੁਰਸ਼ਿਦ ਵੇਖ ਨਾ ਰੱਜਾਂ ਹੂ 
ਲੂੰ ਲੂੰ ਦੇ ਮੁੱਢ ਲੱਖ ਲੱਖ ਚਸ਼ਮਾ, ਇੱਕ ਖੋਲ੍ਹਾਂ ਇੱਕ ਕੱਜਾਂ ਹੂ 
ਇਤਨਾ ਡਿੱਠਿਆਂ ਸਬਰ ਨਾ ਆਵੇ, ਹੋਰ ਕਿਤਹਿ ਵੱਲ ਭੱਜਾਂ ਹੂ 
ਮੁਰਸ਼ਿਦ ਦਾ ਦੀਦਾਰ ਹੈ 'ਬਾਹੂ', ਲੱਖ ਕਰੋੜਾਂ ਹੱਜਾਂ ਹੂ ... ਸੀਹਰਫ਼ੀ ਬਾਹੂ

A Poem by Shiv Raj Ludhianvi

ਭੁਖੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਨੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ
ਰੰਗ ਹਵਸ ਦੇ ਰੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ
ਨਾਲ ਮੋਹੱਬਤ ਭਰੀਆਂ ਭਰੀਆਂ 
ਕਿਥੋਂ ਲਭੀਏ ਚੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ

ਇਸ਼ਕ਼ ਇਸ਼ਕ਼ ਹੈ ਕਰਦੀ ਦੁਨੀਆਂ
ਇਸ਼ਕ਼ ਕਿਸੇ ਦੇ ਵੱਸ ਦਾ ਨਈਂ
ਖੁਦ ਹੀ ਯਾਰ ਤਮਾਸ਼ਾ ਬਣਕੇ 
ਭੋਰਾ ਨਾ ਇਹ ਸੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ

ਮੇਰੀ ਕੀ ਔਕਾਤ ਭਲਾਂ ਮੈਂ
ਖੁਦ ਨੂੰ ਸੂਰਜ ਆਖ ਸਕਾਂ
ਆਪਣਾ ਅੰਦਰ ਦੇਖਣ ਨੂੰ ਮੈਂ
ਯਾਰ ਖੁਦਾ ਤੋਂ ਮੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ

ਦਰ ਦਰ ਉੱਤੇ ਰੁਲਦੀ ਦੇਖੀ
ਬੁੱਢੀ " ਮਾਂ" ਮਜਬੂਰ ਕੋਈ
ਕਿਸੇ ਦੀ ਪਥਰ ਅੱਖ ਨਾਂ ਰੋਈ
ਦੇਖ ਦੇਖ ਸਭ ਲੰਘੀਆਂ ਅੱਖਾਂ
ਭੁਖੀਆਂ ਅਖਾਂ ਨੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ
ਰੰਗ ਹਵਸ ਦੇ ਰੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ
ਨਾਲ ਮੋਹੱਬਤ ਭਰੀਆਂ ਭਰੀਆਂ
ਕਿਥੋਂ ਲਭੀਏ ਚੰਗੀਆਂ ਅੱਖਾਂ .................ਸ਼ਿਵ ਰਾਜ ਲੁਧਿਆਨਵੀ
जबसे आकर बैठा हूँ फनकारों में...
मैं भी डूबा रहता हूँ किरदारों में...
मेरा दिल तो सदियों से आवारा है...
मुझको शामिल मत कर दुनियादारों में...
मुश्किल से रौशन होता है ये आलम...
मत लाओ तारीकी को उजियारों में...
मैं तो मिट्टी हूँ मेरी कीमत क्या है...
सोने-चाँदी बिकते हैं बाजारों में...
यूं ही अरमानों का खूं करते रहना...
'वाहिद दम आ जायेगा अश आरों में.. बलवान सिंह 'वाहिद'
ਇੱਥੇ ਬਾਲ ਹੈ ਰੋਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਖਿੜਖਿੱਲੀਆਂ ਪਾਉਂਦਾ ,
ਭਾਵੇਂ ਇੱਕ ਵੀ ਲਫ਼ਜ਼ ਅਜੇ ਤੱਕ ਕਹਿ ਨਹੀਂ ਪਾਇਆ।
ਸਮਾਂ ਆਏਗਾ ਤੇ ਸਭ ਕੁਝ ਉਹ ਖ਼ੁਦ ਦੱਸੇਗਾ ,
ਕੌਣ ਹੈ ਉਹ ਤੇ ਕਾਹਦੇ ਲਈ ਦੁਨੀਆ 'ਤੇ ਆਇਆ।
(ਪੰਘੂੜੇ ਉੱਤੇ ਉੱਕਰੇ ਸ਼ਬਦ)
'ਮੇਰਾ ਦਾਗਿਸਤਾਨ' ਵਿੱਚੋਂ
इस तरह फैला हुआ काजल ...
मत्लब…. मैं याद आता हूँ ... अज्ञात 

Is Tarah Faila hua kajal..
matlab...main yaad aata hoon... unknown
ख़ाब रूठ जाएँ 
तो आँखों में 
धीरे धीरे थकान उतरने लगती है ...
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में 
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं ..
ये सोच कर कि शायद खिड़की से झाँक ले वो
गली में खेलते बच्चे लड़ा दिए मैंने ... अज्ञात

Ye soch kar ki shayad khidki se jhaank le woh,
Gli meiN khelte bache lda diye maine.. Unknown
ਸਰਕਸ ਦੀ ਰੱਸੀ ਵਰਗਾ ਸੀ 
ਹਰ ਛੋਟਾ ਵੱਡਾ ਸੱਚ 
ਜਿਸ 'ਤੇ ਤੁਰਦਿਆਂ ਬੰਦਾ 
ਕਦੇ ਥਰ-ਥਰ ਕੰਬਦਾ ਹੈ 
ਤੇ ਕਦੇ ਮਸਖਰੇ ਵਾਂਗ 
ਅਦਾਵਾਂ ਕਰਨ ਲੱਗਦਾ ਹੈ.. ਪਰਮਿੰਦਰ ਸੋਢੀ
ਪਹਾੜੀ ਦੀ ਢਲਾਨ ਹੇਠਾਂ 
ਖੇਡਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਉੱਪਰ 
ਚਟਾਨ ਰੋੜ੍ਹ ਕੇ 
ਆਪਣੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਤੋਂ 
ਮੁਕਤ ਹੋ ਗਏ ਲੋਕ.. ਪਰਮਿੰਦਰ ਸੋਢੀ
ਜਦੋਂ ਕਿਸੇ ਆਮ ਆਦਮੀ ਨੂੰ ਗਿਆਨ ਹਾਸਿਲ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਉਹ ਦਾਰਸ਼ਨਿਕ ਜਾਂ ਵਿਵੇਕੀ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜਦੋਂ ਕਿਸੇ ਦਾਰਸ਼ਨਿਕ ਜਾਂ ਵਿਵੇਕੀ ਨੂੰ ਗਿਆਨ ਹਾਸਿਲ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਉਹ ਆਮ ਆਦਮੀ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ..ਜ਼ੇਨ
ਗੂੰਗੇ ਪੱਥਰਾਂ ਲਈ ਹਾਰ ਪਰੋਇਆ 
ਮੈਂ ਫੁੱਲਾਂ ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰਕੇ ... ਜਸਵੀਰ ਜੀਦਾ
रहनुमाई कर सके जो क़फ़िले की बेग़रज़ 
इस जहाँ में ऐसा कोई रहनुमा मिलता नहीं..
ਮਨਾਂ ਦੇ ਰਾਹ ਐਨੇ ਵੀ ਉਲਝੇ ਨਹੀਂ 
ਕਿ ਅਹਿਸਾਸ ਦੀ ਧਰਤ ਤੇ 
ਬੋਲ ਸਾਂਝੇ ਨਾ ਕਰ ਸਕਣ 
ਪਰ ਤੂੰ ਸਿੰਮਲ ਹੈ 
'ਝੁਕਣਾ' 
ਤੈਨੂੰ ਜਾਂਚ ਨਹੀਂ
ਤੇ ਮੈਂ ਘਾਹ ਹਾਂ 
'ਵਧਣਾ' 
ਮੇਰੀ ਮਰਿਆਦਾ ਨਹੀਂ .. ਮਨਦੀਪ
यह सुबह का मंज़र भी क़यामत का हसीन है,
तकिया है कहीं, ज़ुलफ कहीं, और खुद वो कहीं...

Yeh Subah ka manzar bhi Qyamat ka haseen hai,
Tkiya hai kahiN, zulaf kahiN, Aur khud woh kahiN.. Unknown
गुज़रते हैं बिना नक़ाब के जब भी वो चमन से
समझकर फूल, उन के लबों पर तितलियाँ बैठ जाती हैं- Unknown
सूखी दीवारों पे शक्लें सी बनाने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई बढ़ाने आई ..अज्ञात
ਨਿੱਕੀ ਜਿਹੀ ਗਲ ਹੈ ਪਰ ਹਵਾ ਨੂੰ ਕਿੰਝ ਸਮਝਾਵਾਂਗੇ ,
ਕਿ ਦੀਵੇ ਤੇ ਮੇਰੀ ਮਾਂ ,ਮੇਰੇ ਲਈ ਕਾਜਲ ਬਣਾਉਦੀ ਹੈ ..........
किसी लिबास की खुशबू जब उड़ कर आती है 
तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है ... Jaun Eliya
शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी 
नाज़ से काम क्यूँ नहीं लेती 
आप, वो, जी, मगर, ये सब क्या है 
तुम मेरा नाम क्यूँ नहीं लेती .. Jaun Eliya
कौन सूद-ओ-ज़ियाँ की दुनिया में 
दर्द-ए-ग़ुरबत का साथ देता है 
जब मुक़ाबिल हों इश्क और दौलत 
हुस्न दौलत का साथ देता है ... Jaun Eliya
कौन इस घर की देखभाल करे 
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है… 
Kaun is ghar ki dekh bhaal kare,
Roz ik cheez toot jaati hai.. Jaun Eliya
तुझसे बिछड़ कर क्या हूँ मैं , अब बाहर आकर देख 
हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिलाकर देख… 
शाम है गहरी,तेज़ हवा है,सर पे खड़ी है रात 
रास्ता गए मुसाफ़िर का अब दीया जला कर देख… Munir Niazi

Aje taN manzil door see... a poem by Vijay Vivek

ਅਜੇ ਤਾਂ ਦੂਰ ਸੀ ਮੰਜਿਲ ਨਜ਼ਰ ਤੋਂ ਦੂਰ ਕਿਤੇ,
ਇਹ ਰਸਤਿਆਂ 'ਚ ਹੀ ਕੀ ਕੀ ਅੜਾਉਣੀਆਂ ਪਈਆਂ,
ਇੱਕ ਤਾਂ ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਜ਼ਖਮ ਦੂਸਰਾ ਸਫ਼ਰ ਥਲ ਦਾ
ਤੇ ਤੀਜਾ ਕਿਸ਼ਤੀਆਂ ਸਿਰ ਤੇ ਉਠਾਉਣੀਆਂ ਪਈਆਂ।

ਮੇਰੇ ਹਬੀਬ, ਮੇਰੇ ਹਮਸਫ਼ਰ ਤੇ ਹਮਸਾਏ,
ਖ਼ਿਜਾ ਜਲਾਉਣ ਗਏ, ਬਿਰਖ ਜਲਾ ਆਏ,
ਨਹੀ ਸਲੀਬ 'ਤੇ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਝੁਕਾਉਣੀਆਂ ਸੀ ਕਦੀ,
ਨਿਗ਼ਾਹਾਂ ਸ਼ਰਮ ਦੇ ਮਾਰੇ ਝੁਕਾਉਣੀਆਂ ਪਈਆਂ।

ਕਿਸੇ ਚਿਰਾਗ ਦੇ ਮਸਤਕ 'ਚੋਂ ਤੋੜ ਕੇ ਕਿਰਨਾ,
ਤਸੀਂ ਜਾਂ ਸੱਟ ਗਏ ਝੰਬ ਕੇ ਮਰੋੜ ਕੇ ਕਿਰਨਾ,
ਮਿਸ਼ਾਲਾਂ ਮਮਟੀਆਂ 'ਤੇ ਜਗਦੀਆਂ ਸੀ ਪਰ ਸਾਨੂੰ
ਉਠਾ ਕੇ ਸੀਨਿਆਂ ਅੰਦਰ ਜਗਾਉਣੀਆਂ ਪਈਆਂ।

ਬਹੁਤ ਮਾਸੂਮ ਸਨ ਕੰਜਕਾਂ ਕੁਆਰੀਆਂ ਗ਼ਜ਼ਲਾਂ,
ਤੇ ਧਾਹਾਂ ਮਾਰ ਕੇ ਰੋਈਆਂ ਵਿਚਾਰੀਆਂ ਗ਼ਜ਼ਲਾਂ,
ਅਸੀਂ ਤਾਂ ਸਾਵਿਆਂ ਬਿਰਖਾਂ ਦੇ ਇਸ਼ਕ ਵਿੱਚ ਲਿਖੀਆਂ,
ਤੇ ਸਾਨੂੰ ਕੁਰਸੀਆਂ ਤਾਈਂ ਸੁਣਾਉਣੀਆਂ ਪਈਆਂ।

-ਵਿਜੇ ਵਿਵੇਕ
ਕਿਸੇ ਦੀ ਸੋਚ ਦਾ ਖ਼ੰਜਰ ਮੇਰੀ ਤਲਾਸ਼ 'ਚ ਹੈ ।
ਮੇਰਾ ਨਸੀਬ ਨਿਰੰਤਰ ਮੇਰੀ ਤਲਾਸ਼ 'ਚ ਹੈ।
ਇਹ ਧਰਤ ਨਿਗਲਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਏ ਮੈਨੂੰ ਜੀਂਦੇ ਨੂੰ
ਗਿਰੇਗਾ ਮੇਰੇ 'ਤੇ ਅੰਬਰ ਮੇਰੀ ਤਲਾਸ਼ 'ਚ ਹੈ।
ਕਦਮ ਕਦਮ 'ਤੇ ਮੁਸੀਬਤ ਕਹੇ "ਜੀ ਆਇਆ ਨੂੰ"
ਹਰੇਕ ਮੋੜ ਦੀ ਠੋਕਰ ਮੇਰੀ ਤਲਾਸ਼ 'ਚ ਹੈ।
ਤਲਾਸ਼ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਲੀਰਾਂ ਮੈਂ ਨੰਗੇ ਤਨ ਖ਼ਾਤਿਰ
ਮਗਰ ਮਜ਼ਾਰ ਦੀ ਚਾਦਰ ਮੇਰੀ ਤਲਾਸ਼ 'ਚ ਹੈ।
ਮੈਂ ਬੂੰਦ ਹਾਂ ਮਗਰ ਉਸ ਵਿਚ ਵਿਲੀਨ ਕਿਉਂ ਹੋਵਾਂ ?
ਰਹੇ ਜੇ ਕੋਈ ਸਮੁੰਦਰ ਮੇਰੀ ਤਲਾਸ਼ 'ਚ ਹੈ।
---ਅਮਰੀਕ ਗ਼ਾਫ਼ਿਲ

Friday, October 4, 2013

Ik Bagal MeiN chaaNd hoga(In Hindi).. By Piyush Mishra

इक बगल में चाँद होगा , इक बगल में रोटियां 
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियां 
हम चाँद पे रोटी की चादर डालकर सो जायेंगे 
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आयेंगे...

इक बगल में खनखनाती सीपियाँ हो जाएँगी 
इक बगल में कुछ रुलाती सिसकियाँ हो जाएँगी 
हम सीपियों में भरकर सारे तारे छू के आएंगे 
और सिसकियों को गुदगुदी कर कर के यूं बहलाएँगे ...

अम्मा तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा 
ग़म न कर जो आयेगा वो फ़िर कभी न जायेगा 
याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी 
लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी ....

होनी और अनहोनी की परवाह किसे है मेरी जान 
हद से ज़्यादा ये ही होगा कि यहीं मर जायेंगे 
हम मौत को सपना बताकर उठ खड़े होंगे यहीं 

और होनी को ठेंगा दिखाकर खिलखिलाते जायेंगे ... Piyush Mishra

Wednesday, October 2, 2013

हम'जुबां मेरे थे इनके दिल मगर अच्छे न थे 
मंज़िलें अच्छी थी मेरे हमसफ़र अच्छे न थे 
जो ख़बर पहुंची यहाँ तक असल सूरत में न थी 
थी ख़बर अच्छी मगर अहल-ए-ख़बर अच्छे न थे… मुनीर निआज़ी