वक़्त की आंख पे पट्टी बांध के
चोर सिपाही खेल रहे थे--
रात और दिन और चाँद और मैं --
जाने कैसे गर्दिश में जा के अटका पाँव
दूर गिरा जा कर मैं जैसे,
रोशनियों के धक्के से परछाई ज़मीं पर गिरती है ...
थेप्पा छूने से पहले ही--
वक़्त ने चोर कहा और ऑंखें खोल के
मुझको पकड़ लिया-- गुलज़ार साहिब
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