पुराने पड़ गये हैं डर, फेंक दो तुम भी,
ये कचरा आह बाहर फेंक दो तुम भी
लपट आने लगी है अब हवाओं में
ओसारे और छप्पर फेंक दो तुम भी
यहाँ मासूम सपने जी नहीं पाते,
इन्हें कुंकुम लगाकर फेंक दो तुम भी
तुम्हें भी इस बहाने याद कर लेंगे
इधर दो चार पत्थर फेंक दो तुम भी
ये मूरत बोल सकती है अगर चाहो
अगर कुछ शब्द कुछ स्वर फेंक दो इधर भी
किसी संवेदना के काम आएंगे,
यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी.. दुष्यंत कुमार
ये कचरा आह बाहर फेंक दो तुम भी
लपट आने लगी है अब हवाओं में
ओसारे और छप्पर फेंक दो तुम भी
यहाँ मासूम सपने जी नहीं पाते,
इन्हें कुंकुम लगाकर फेंक दो तुम भी
तुम्हें भी इस बहाने याद कर लेंगे
इधर दो चार पत्थर फेंक दो तुम भी
ये मूरत बोल सकती है अगर चाहो
अगर कुछ शब्द कुछ स्वर फेंक दो इधर भी
किसी संवेदना के काम आएंगे,
यहाँ टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी.. दुष्यंत कुमार
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