Tuesday, January 31, 2012

तुम मेरी अनकही आंख के तेवर न भुला पाओगे 
अनकही बात को समझोगे तो याद आऊंगा 
हमने खुशिओं की तरह दुःख भी इकठ्ठे देखे 
सफाह-ए-ज़ीस्त को पल्टाओगे तो याद आ जाऊंगा 
इसी अंदाज़ में होते थे मुखातिब मुझसे 
ख़त किसी और को लिखोगे तो याद आ जाऊंगा
सर्द रातों के महकते हुए सन्नाटों में
जब किसी फूल को चूमोगे तो याद आ जाऊंगा 
अब तेरे अश्क मैं होंठों से चुरा लेता हूँ
हाथ से खुद इन्हें पूंछोगे तो याद आऊंगा
शाल कौन पहनायेगा अब कौन दिसंबर में तुम्हें
बारिशों में कभी भीगोगे तो याद आऊंगा 
आज तुम महफ़िल-ए-यारां पे हो मगरूर बहुत 
जब कभी टूट के बिखरोगे तो याद आऊंगा  
हादसे आयेंगे जीवन में तो तुम होके निढ़ाल
किसी तस्वीर को थामोगे तो याद आऊंगा 
इस में शामिल है मेरी बखत की तारीकी भी 
तुम सिआह रंग जो पहनोगे तो याद आऊंगा... Wasi Shah

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