Tuesday, January 31, 2012

क्या हुआ जो बात करना हमें आया ही नहीं
फिर भी चेहरे पर कोई चेहरा लगाया ही नहीं
आप तो क्या चीज़ हैं पत्थर पिघल जाते जनाब
गीत कोई अब तक हमने दिल से गाया ही नहीं
रोज़ आता है यहाँ वो रात के पिछले पहर
नींद से लेकिन कभी उसने जगाया ही नहीं
मुस्कुराया वो मेरे कुछ पूछने पर इस तरह
कुछ बताया भी नहीं लेकिन कुछ छुपाया भी नहीं
क्या डराएगा कोई साया हमें "कैफ़ी" यहाँ
उसके हम बंदे हैं साहिब! जिसका साया ही नहीं...
---हबीब कैफ़ी

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