दलदल थी ज़िन्दगी सो मैं धंसता चला गया …
मैं अपनी बेबसी पे यूँ हँसता चला गया
पहले दिखा रहा था मुझे मंजिलों के ख़्वाब
फिर मेरे सामने से वो रास्ता चला गया..
मैं रो पड़ा था जिस की जुदाई को सोच कर वसी ,
वो शख्स मेरे हाल पे हँसता चला गया...
मैं खुद लिपट गया था जिसे यार जानकार
वो सांप की तरह मुझे डसटा चला गया.. Wasi Shah
मैं अपनी बेबसी पे यूँ हँसता चला गया
पहले दिखा रहा था मुझे मंजिलों के ख़्वाब
फिर मेरे सामने से वो रास्ता चला गया..
मैं रो पड़ा था जिस की जुदाई को सोच कर वसी ,
वो शख्स मेरे हाल पे हँसता चला गया...
मैं खुद लिपट गया था जिसे यार जानकार
वो सांप की तरह मुझे डसटा चला गया.. Wasi Shah
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