तुम ही ने हम को सुनाया न अपना दुःख वरना
दुआ वो करते के हम आसमान हिला देते.. Wasi ShahThis blog is like my virtual diary where I note down poetry, quotes and other work of literature while reading. I hope you will have good time here. Love, Jassi Sangha.
Tuesday, January 31, 2012
तुम मेरी अनकही आंख के तेवर न भुला पाओगे
अनकही बात को समझोगे तो याद आऊंगा
हमने खुशिओं की तरह दुःख भी इकठ्ठे देखे
सफाह-ए-ज़ीस्त को पल्टाओगे तो याद आ जाऊंगा
इसी अंदाज़ में होते थे मुखातिब मुझसे
ख़त किसी और को लिखोगे तो याद आ जाऊंगा
सर्द रातों के महकते हुए सन्नाटों में
जब किसी फूल को चूमोगे तो याद आ जाऊंगा
अब तेरे अश्क मैं होंठों से चुरा लेता हूँ
हाथ से खुद इन्हें पूंछोगे तो याद आऊंगा
शाल कौन पहनायेगा अब कौन दिसंबर में तुम्हें
बारिशों में कभी भीगोगे तो याद आऊंगा
आज तुम महफ़िल-ए-यारां पे हो मगरूर बहुत
जब कभी टूट के बिखरोगे तो याद आऊंगा हादसे आयेंगे जीवन में तो तुम होके निढ़ाल
किसी तस्वीर को थामोगे तो याद आऊंगा
इस में शामिल है मेरी बखत की तारीकी भी
तुम सिआह रंग जो पहनोगे तो याद आऊंगा... Wasi Shahकाश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
तू बड़े प्यार से चाव से भरे अरमान के साथ
अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को
और बेताबी से फुरक़त के खिजां लम्हों में
तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझको
मैं तेरे हाथ की खुशबु से महक जाता
जब कभी मूड में आकर मुझे चूमा करती
तेरे होंठों की शिद्दत से मैं दहक सा जाता
रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती
मरमरी हाथ का इक तकिया बनाया करती
मैं तेरे कान से लग कर के बातें करता
तेरी ज़ुल्फ़ों को,तेरे गाल को चूमा करता
मुझको बेताब सा रखता तेरी चाहत का नशा
मैं तेरी रूह के गुलशन में महकता सा रहता
मैं तेरे जिसम के आंगन में खनकता रहता
कुछ नहीं तो यही बेनाब सा बंधन होता
काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता...Wasi Shah
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !!
अक्सर तुझको देखा है
कि
ताना बुनते
जब कोई धागा टूट गया
या
ख़तम हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
एक भी गाँठ
गिरह बुन्तर की
देख नही सकता कोई
मैंने तो एक बारबुना था
एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
अक्सर तुझको देखा है
कि
ताना बुनते
जब कोई धागा टूट गया
या
ख़तम हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
एक भी गाँठ
गिरह बुन्तर की
देख नही सकता कोई
मैंने तो एक बारबुना था
एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
मुझको तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
दलदल थी ज़िन्दगी सो मैं धंसता चला गया …
मैं अपनी बेबसी पे यूँ हँसता चला गया
पहले दिखा रहा था मुझे मंजिलों के ख़्वाब
फिर मेरे सामने से वो रास्ता चला गया..
मैं रो पड़ा था जिस की जुदाई को सोच कर वसी ,
वो शख्स मेरे हाल पे हँसता चला गया...
मैं खुद लिपट गया था जिसे यार जानकार
वो सांप की तरह मुझे डसटा चला गया.. Wasi Shah
मैं अपनी बेबसी पे यूँ हँसता चला गया
पहले दिखा रहा था मुझे मंजिलों के ख़्वाब
फिर मेरे सामने से वो रास्ता चला गया..
मैं रो पड़ा था जिस की जुदाई को सोच कर वसी ,
वो शख्स मेरे हाल पे हँसता चला गया...
मैं खुद लिपट गया था जिसे यार जानकार
वो सांप की तरह मुझे डसटा चला गया.. Wasi Shah
मुझे और कहीं ले चल वसी
जहाँ रात कभी सोई न हो..
जहाँ सुबह किसी पे रोई न हो ,
जहाँ हिज़्र ने वहशत बोई न हो ..
जहाँ कोई चीज़ इसी की खोई न हो ,
जहाँ लोग हों सारे बेगाने ,
जहाँ सब के सब हों दीवाने ,
जहाँ कोई झूठ हो न अफ़साने..
जहाँ कोई हम को न पहचाने ,
मुझे और कहीं ले चल वसी
जहाँ नफ़रत दिल में बस न सके ,
जहाँ कोई किसी को डस न सके ,
जहाँ कोई किसी पे हंस न सके ,
मुझे और कहीं ले चल वसी...Wasi Shah
जहाँ रात कभी सोई न हो..
जहाँ सुबह किसी पे रोई न हो ,
जहाँ हिज़्र ने वहशत बोई न हो ..
जहाँ कोई चीज़ इसी की खोई न हो ,
जहाँ लोग हों सारे बेगाने ,
जहाँ सब के सब हों दीवाने ,
जहाँ कोई झूठ हो न अफ़साने..
जहाँ कोई हम को न पहचाने ,
मुझे और कहीं ले चल वसी
जहाँ नफ़रत दिल में बस न सके ,
जहाँ कोई किसी को डस न सके ,
जहाँ कोई किसी पे हंस न सके ,
मुझे और कहीं ले चल वसी...Wasi Shah
"जीवन की आपाधापी में"
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
Harivansh Rai Bachchan
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
Harivansh Rai Bachchan
इतिहास : शब्द -अर्थहीन
पर इस सार्थकता को तुम मुझे
कैसे समझाओगे कनु?
शब्द, शब्द, शब्द…….
मेरे लिए सब अर्थहीन हैं
यदि वे मेरे पास बैठकर
मेरे रूखे कुन्तलों में उँगलियाँ उलझाए हुए
तुम्हारे काँपते अधरों से नहीं निकलते
शब्द, शब्द, शब्द…….
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व……..
मैंने भी गली-गली सुने हैं ये शब्द
अर्जुन ने चाहे इनमें कुछ भी पाया हो
मैं इन्हें सुनकर कुछ भी नहीं पाती प्रिय,
सिर्फ राह में ठिठक कर
तुम्हारे उन अधरों की कल्पना करती हूँ
जिनसे तुमने ये शब्द पहली बार कहे होंगे
- तुम्हारा साँवरा लहराता हुआ जिस्म
तुम्हारी किंचित मुड़ी हुई शंख-ग्रीवा
तुम्हारी उठी हुई चंदन-बाँहें
तुम्हारी अपने में डूबी हुई
अधखुली दृष्टि
धीरे-धीरे हिलते हुए होठ!
मैं कल्पना करती हूँ कि
अर्जुन की जगह मैं हूँ
और मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है
और मैं नहीं जानती कि युद्ध कौन-सा है
और मैं किसके पक्ष में हूँ
और समस्या क्या है
और लड़ाई किस बात की है
लेकिन मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है
क्योंकि तुम्हारे द्वारा समझाया जाना
मुझे बहुत अच्छा लगता है
और सेनाएँ स्तब्ध खड़ी हैं
और इतिहास स्थगित हो गया है
और तुम मुझे समझा रहे हो……
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व,
शब्द, शब्द, शब्द…….
मेरे लिए नितान्त अर्थहीन हैं-
मैं इन सबके परे अपलक तुम्हें देख रही हूँ
हर शब्द को अँजुरी बनाकर
बूँद-बूँद तुम्हें पी रही हूँ
और तुम्हारा तेज
मेरे जिस्म के एक-एक मूर्छित संवेदन को
धधका रहा है
और तुम्हारे जादू भरे होठों से
रजनीगन्धा के फूलों की तरह टप्-टप् शब्द झर रहे हैं
एक के बाद एक के बाद एक……
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व……..
मुझ तक आते-आते सब बदल गए हैं
मुझे सुन पड़ता है केवल
राधन्, राधन्, राधन्,
शब्द, शब्द, शब्द,
तुम्हारे शब्द अगणित हैं कनु -संख्यातीत
पर उनका अर्थ मात्र एक है -
मैं,
मैं,
केवल मैं!
फिर उन शब्दों से
मुझी को
इतिहास कैसे समझाओगे कनु?
--Dharamveer Bharti
पर इस सार्थकता को तुम मुझे
कैसे समझाओगे कनु?
शब्द, शब्द, शब्द…….
मेरे लिए सब अर्थहीन हैं
यदि वे मेरे पास बैठकर
मेरे रूखे कुन्तलों में उँगलियाँ उलझाए हुए
तुम्हारे काँपते अधरों से नहीं निकलते
शब्द, शब्द, शब्द…….
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व……..
मैंने भी गली-गली सुने हैं ये शब्द
अर्जुन ने चाहे इनमें कुछ भी पाया हो
मैं इन्हें सुनकर कुछ भी नहीं पाती प्रिय,
सिर्फ राह में ठिठक कर
तुम्हारे उन अधरों की कल्पना करती हूँ
जिनसे तुमने ये शब्द पहली बार कहे होंगे
- तुम्हारा साँवरा लहराता हुआ जिस्म
तुम्हारी किंचित मुड़ी हुई शंख-ग्रीवा
तुम्हारी उठी हुई चंदन-बाँहें
तुम्हारी अपने में डूबी हुई
अधखुली दृष्टि
धीरे-धीरे हिलते हुए होठ!
मैं कल्पना करती हूँ कि
अर्जुन की जगह मैं हूँ
और मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है
और मैं नहीं जानती कि युद्ध कौन-सा है
और मैं किसके पक्ष में हूँ
और समस्या क्या है
और लड़ाई किस बात की है
लेकिन मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है
क्योंकि तुम्हारे द्वारा समझाया जाना
मुझे बहुत अच्छा लगता है
और सेनाएँ स्तब्ध खड़ी हैं
और इतिहास स्थगित हो गया है
और तुम मुझे समझा रहे हो……
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व,
शब्द, शब्द, शब्द…….
मेरे लिए नितान्त अर्थहीन हैं-
मैं इन सबके परे अपलक तुम्हें देख रही हूँ
हर शब्द को अँजुरी बनाकर
बूँद-बूँद तुम्हें पी रही हूँ
और तुम्हारा तेज
मेरे जिस्म के एक-एक मूर्छित संवेदन को
धधका रहा है
और तुम्हारे जादू भरे होठों से
रजनीगन्धा के फूलों की तरह टप्-टप् शब्द झर रहे हैं
एक के बाद एक के बाद एक……
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व……..
मुझ तक आते-आते सब बदल गए हैं
मुझे सुन पड़ता है केवल
राधन्, राधन्, राधन्,
शब्द, शब्द, शब्द,
तुम्हारे शब्द अगणित हैं कनु -संख्यातीत
पर उनका अर्थ मात्र एक है -
मैं,
मैं,
केवल मैं!
फिर उन शब्दों से
मुझी को
इतिहास कैसे समझाओगे कनु?
--Dharamveer Bharti
क्या हुआ जो बात करना हमें आया ही नहीं
फिर भी चेहरे पर कोई चेहरा लगाया ही नहीं
आप तो क्या चीज़ हैं पत्थर पिघल जाते जनाब
गीत कोई अब तक हमने दिल से गाया ही नहीं
रोज़ आता है यहाँ वो रात के पिछले पहर
नींद से लेकिन कभी उसने जगाया ही नहीं
मुस्कुराया वो मेरे कुछ पूछने पर इस तरह
कुछ बताया भी नहीं लेकिन कुछ छुपाया भी नहीं
क्या डराएगा कोई साया हमें "कैफ़ी" यहाँ
उसके हम बंदे हैं साहिब! जिसका साया ही नहीं...
---हबीब कैफ़ी
फिर भी चेहरे पर कोई चेहरा लगाया ही नहीं
आप तो क्या चीज़ हैं पत्थर पिघल जाते जनाब
गीत कोई अब तक हमने दिल से गाया ही नहीं
रोज़ आता है यहाँ वो रात के पिछले पहर
नींद से लेकिन कभी उसने जगाया ही नहीं
मुस्कुराया वो मेरे कुछ पूछने पर इस तरह
कुछ बताया भी नहीं लेकिन कुछ छुपाया भी नहीं
क्या डराएगा कोई साया हमें "कैफ़ी" यहाँ
उसके हम बंदे हैं साहिब! जिसका साया ही नहीं...
---हबीब कैफ़ी
कनुप्रिया
क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु?
लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी!
इसी लिए तब
मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,
इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था
तुम्हारे गोलोक का
कालावधिहीन रास,
क्योंकि मुझे फिर आना था!
तुमने मुझे पुकारा था न
मैं आ गई हूँ कनु।
और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के
कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।
कि, इस बार इतिहास बनाते समय
तुम अकेले ना छूट जाओ!
सुनो मेरे प्यार!
प्रगाढ़ केलिक्षणों में अपनी अंतरंग
सखी को तुमने बाँहों में गूँथा
पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गए प्रभु?
बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता
तुम्हारे इतिहास का
शब्द, शब्द, शब्द…
राधा के बिना
सब
रक्त के प्यासे
अर्थहीन शब्द!
सुनो मेरे प्यार!
तुम्हें मेरी ज़रूरत थी न, लो मैं सब छोड़कर आ गई हूँ
ताकि कोई यह न कहे
कि तुम्हारी अंतरंग केलिसखी
केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की
लय बन तक रह गई……
मैं आ गई हूँ प्रिय!
मेरी वेणी में अग्निपुष्प गूँथने वाली
तुम्हारी उँगलियाँ
अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथती?
तुमने मुझे पुकारा था न!
मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर
तुम्हारी प्रतीक्षा में
अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे!
---धर्मवीर भारती
क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु?
लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी!
इसी लिए तब
मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,
इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था
तुम्हारे गोलोक का
कालावधिहीन रास,
क्योंकि मुझे फिर आना था!
तुमने मुझे पुकारा था न
मैं आ गई हूँ कनु।
और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के
कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।
कि, इस बार इतिहास बनाते समय
तुम अकेले ना छूट जाओ!
सुनो मेरे प्यार!
प्रगाढ़ केलिक्षणों में अपनी अंतरंग
सखी को तुमने बाँहों में गूँथा
पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गए प्रभु?
बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता
तुम्हारे इतिहास का
शब्द, शब्द, शब्द…
राधा के बिना
सब
रक्त के प्यासे
अर्थहीन शब्द!
सुनो मेरे प्यार!
तुम्हें मेरी ज़रूरत थी न, लो मैं सब छोड़कर आ गई हूँ
ताकि कोई यह न कहे
कि तुम्हारी अंतरंग केलिसखी
केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की
लय बन तक रह गई……
मैं आ गई हूँ प्रिय!
मेरी वेणी में अग्निपुष्प गूँथने वाली
तुम्हारी उँगलियाँ
अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथती?
तुमने मुझे पुकारा था न!
मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर
तुम्हारी प्रतीक्षा में
अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे!
---धर्मवीर भारती
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा।
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालुम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।
कितनी सच्चाई से मुझसे ज़िंदगी ने कह दीया,
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा।
मैं खुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तों,
ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जायेगा।
रूठ जाना तो मोहब्बत की अलामत है मगर,
क्या खबर थी मुझ से वो इतना खफा हो जायेगा..Bashir Badar
मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला.
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला.
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला.
बहुत अजीब है ये कुर्बतों की दूरी भी
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला.
खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने
बस एक शख्स को माँगा मुझे वो ही न मिला... Basheer Badar
दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .
जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .
जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .
यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं ...
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
बहुत देर है
बस के आने में
आओ
कहीं पास के लान पर बैठ जाएँ
चटखता है मेरी भी रग-रग में सूरज
बहुत देर से तुम भी चुप-चुप खड़ी हो
न मैं तुमसे वाक़िफ़
न तुम मूझसे वाक़िफ़
नई सारी बातें, नए सारे किस्से
चमकते हुए लफ़्ज, चमकीले लहज़े
फ़क़त चन्द लम्हे
न मैं अपने दु:ख-दर्द की बात छेड़ूँ
न तुम अपने घर की कहानी सुनाओ
मैं मौसम बनूँ
तुम फ़ज़ाएँ जगाओ.
वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे
Monday, January 30, 2012
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ਮੇਰੇ ਪਿੰਡ ਸੂਰਜ ਕੁਝ ਹੋਰ ਤਰ੍ਹਾਂ ਡੁੱਬਦਾ ਹੈ ਤੁਹਾਡੇ ਸ਼ਹਿਰ ਵਾਂਗ ਨਹੀਂ ਕਿ ਬਾਲਕੋਨੀ ਤੋਂ ਕੜੱਚ ਦੇਣੀ ਸੜਕ ‘ਤੇ ਜਾ ਡਿੱਗੇ ਤੇ ਇਕ-ਦਮ, ਦਮ ਤੋੜ ਜਾਏ ਮੇਰੇ ਪਿੰ...
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कोई चिंगारी नहीं जलती कहीं ठंडे बदन में सांस के टूटे हुए तागे लटकते हैं गले में बुलबुले पानी के अटके हुए बर्फ़ाब लहू में नींद पथरायी हुई...