Tuesday, January 31, 2012

तुम ही ने हम को सुनाया न अपना दुःख वरना 
दुआ वो करते के हम आसमान हिला देते.. Wasi Shah
तुम मेरी अनकही आंख के तेवर न भुला पाओगे 
अनकही बात को समझोगे तो याद आऊंगा 
हमने खुशिओं की तरह दुःख भी इकठ्ठे देखे 
सफाह-ए-ज़ीस्त को पल्टाओगे तो याद आ जाऊंगा 
इसी अंदाज़ में होते थे मुखातिब मुझसे 
ख़त किसी और को लिखोगे तो याद आ जाऊंगा
सर्द रातों के महकते हुए सन्नाटों में
जब किसी फूल को चूमोगे तो याद आ जाऊंगा 
अब तेरे अश्क मैं होंठों से चुरा लेता हूँ
हाथ से खुद इन्हें पूंछोगे तो याद आऊंगा
शाल कौन पहनायेगा अब कौन दिसंबर में तुम्हें
बारिशों में कभी भीगोगे तो याद आऊंगा 
आज तुम महफ़िल-ए-यारां पे हो मगरूर बहुत 
जब कभी टूट के बिखरोगे तो याद आऊंगा  
हादसे आयेंगे जीवन में तो तुम होके निढ़ाल
किसी तस्वीर को थामोगे तो याद आऊंगा 
इस में शामिल है मेरी बखत की तारीकी भी 
तुम सिआह रंग जो पहनोगे तो याद आऊंगा... Wasi Shah
मैं तेरा मुन्ताज़िर हूँ मुझे मुस्कुरा के मिल

कब तक तुझे तलाश करूं अब आके मिल..
यूं मिल कि फिर जुदाई का लम्हा न आ सके
जो दरम्यान में है सब मिटा के मिल ...
ये क्या कि हम मिलें भी, मुलाक़ात भी न हो वसी

सीने से मत लगा मुझे दिल से लगा के मिल... Wasi Shah
न कर ब्यान उन से हाल-ए-दिल वसी
मगरूर सा शख्स है कहीं साथ न छोड़ दे..
वो कह रही थी समंदर नहीं है आंखें हैं
मैं उन में डूब गया एतबार करते करते
तुम्हारे ग़म की डली उठाकर ज़ुबान पे रख ली है देखो मैंने
ये क़तरा क़तरा पिघल रही है.. मैं क़तरा क़तरा ही जी रहा हूँ

काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
तू बड़े प्यार से चाव से भरे अरमान के साथ
अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को
और बेताबी से फुरक़त के खिजां लम्हों में 

तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझको
मैं तेरे हाथ की खुशबु से महक जाता
जब कभी मूड में आकर मुझे चूमा करती
तेरे होंठों की शिद्दत से मैं दहक सा जाता
रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती
मरमरी हाथ का इक तकिया बनाया करती
मैं तेरे कान से लग कर के बातें करता
तेरी ज़ुल्फ़ों को,तेरे गाल को चूमा करता
मुझको बेताब सा रखता तेरी चाहत का नशा
मैं तेरी रूह के गुलशन में महकता सा रहता
मैं तेरे जिसम के आंगन में खनकता रहता
कुछ नहीं तो यही बेनाब सा बंधन होता
काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता...Wasi Shah
बोलियाँ लगती हैं अब भी खुशबुओं की शहर में
आज भी बाज़ार में बिकती हैं नाज़ुक तितलियाँ..Wasi Shah
न तुम्हें होश रहे न मुझे होश रहे
इस क़दर टूट के चाहो मुझे पागल कर दो
ले जायेंगे गहराई में तुम को भी बहाकर
दरिया के किनारों से मेरा जीकर न करना...
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !!
अक्सर तुझको देखा है
कि
ताना बुनते
जब कोई धागा टूट गया
या
ख़तम हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
एक भी गाँठ
गिरह बुन्तर की
देख नही सकता कोई
मैंने तो एक बारबुना था
एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं  मेरे यार जुलाहे
मुझको तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे






दलदल थी  ज़िन्दगी सो मैं धंसता चला गया  …
मैं अपनी बेबसी पे यूँ हँसता चला गया

पहले दिखा रहा था मुझे मंजिलों के ख़्वाब
फिर मेरे सामने से वो रास्ता चला गया..

मैं रो पड़ा था जिस की जुदाई को सोच कर वसी ,
वो शख्स मेरे हाल पे हँसता चला गया...
मैं खुद लिपट गया था जिसे यार जानकार
वो सांप की तरह मुझे डसटा चला गया.. Wasi Shah
मुझे और कहीं ले चल वसी
जहाँ रात कभी सोई न हो..
जहाँ सुबह किसी पे रोई न हो ,
जहाँ हिज़्र ने वहशत बोई न हो ..
जहाँ कोई चीज़ इसी की खोई न  हो ,
जहाँ लोग हों सारे बेगाने ,
जहाँ सब के सब हों दीवाने ,
जहाँ कोई झूठ हो न अफ़साने..
जहाँ कोई हम को न पहचाने ,
मुझे और कहीं ले चल वसी
जहाँ नफ़रत दिल में बस न सके ,
जहाँ कोई किसी को डस न सके ,
जहाँ कोई किसी पे हंस न सके ,
मुझे और कहीं ले चल वसी...Wasi Shah
शाम होते ही वो चौखट पे जला के शमा
अपनी पलकों पे कई ख्वाब सुलाती होगी.. Wasi Shah
जरा रूठ जाने पे इतनी खुशामद
वसी तुम बिगाड़ोगे आदत किसी की..वसी शाह
मैं हंस के झेल लेता हूँ जुदाई की सभी रस्में ,
गले जब उसके लगता हूँ तो आंखें भीग जाती हैं.. Wasi Shah
"जीवन की आपाधापी में" 
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
 Harivansh Rai Bachchan
इतिहास : शब्द -अर्थहीन 
पर इस सार्थकता को तुम मुझे
कैसे समझाओगे कनु?
शब्द, शब्द, शब्द…….
मेरे लिए सब अर्थहीन हैं
यदि वे मेरे पास बैठकर
मेरे रूखे कुन्तलों में उँगलियाँ उलझाए हुए
तुम्हारे काँपते अधरों से नहीं निकलते
शब्द, शब्द, शब्द…….
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व……..
मैंने भी गली-गली सुने हैं ये शब्द
अर्जुन ने चाहे इनमें कुछ भी पाया हो
मैं इन्हें सुनकर कुछ भी नहीं पाती प्रिय,
सिर्फ राह में ठिठक कर
तुम्हारे उन अधरों की कल्पना करती हूँ
जिनसे तुमने ये शब्द पहली बार कहे होंगे
- तुम्हारा साँवरा लहराता हुआ जिस्म
तुम्हारी किंचित मुड़ी हुई शंख-ग्रीवा
तुम्हारी उठी हुई चंदन-बाँहें
तुम्हारी अपने में डूबी हुई
अधखुली दृष्टि
धीरे-धीरे हिलते हुए होठ!
मैं कल्पना करती हूँ कि
अर्जुन की जगह मैं हूँ
और मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है
और मैं नहीं जानती कि युद्ध कौन-सा है
और मैं किसके पक्ष में हूँ
और समस्या क्या है
और लड़ाई किस बात की है
लेकिन मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है
क्योंकि तुम्हारे द्वारा समझाया जाना
मुझे बहुत अच्छा लगता है
और सेनाएँ स्तब्ध खड़ी हैं
और इतिहास स्थगित हो गया है
और तुम मुझे समझा रहे हो……
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व,
शब्द, शब्द, शब्द…….
मेरे लिए नितान्त अर्थहीन हैं-
मैं इन सबके परे अपलक तुम्हें देख रही हूँ
हर शब्द को अँजुरी बनाकर
बूँद-बूँद तुम्हें पी रही हूँ
और तुम्हारा तेज
मेरे जिस्म के एक-एक मूर्छित संवेदन को
धधका रहा है
और तुम्हारे जादू भरे होठों से
रजनीगन्धा के फूलों की तरह टप्-टप् शब्द झर रहे हैं
एक के बाद एक के बाद एक……
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व……..
मुझ तक आते-आते सब बदल गए हैं
मुझे सुन पड़ता है केवल
राधन्, राधन्, राधन्,
शब्द, शब्द, शब्द,
तुम्हारे शब्द अगणित हैं कनु -संख्यातीत
पर उनका अर्थ मात्र एक है -
मैं,
मैं,
केवल मैं!
फिर उन शब्दों से
मुझी को
इतिहास कैसे समझाओगे कनु?
--Dharamveer Bharti
क्या हुआ जो बात करना हमें आया ही नहीं
फिर भी चेहरे पर कोई चेहरा लगाया ही नहीं
आप तो क्या चीज़ हैं पत्थर पिघल जाते जनाब
गीत कोई अब तक हमने दिल से गाया ही नहीं
रोज़ आता है यहाँ वो रात के पिछले पहर
नींद से लेकिन कभी उसने जगाया ही नहीं
मुस्कुराया वो मेरे कुछ पूछने पर इस तरह
कुछ बताया भी नहीं लेकिन कुछ छुपाया भी नहीं
क्या डराएगा कोई साया हमें "कैफ़ी" यहाँ
उसके हम बंदे हैं साहिब! जिसका साया ही नहीं...
---हबीब कैफ़ी
कनुप्रिया
क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु?
लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी!
इसी लिए तब
मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,
इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था
तुम्हारे गोलोक का
कालावधिहीन रास,
क्योंकि मुझे फिर आना था!
तुमने मुझे पुकारा था न
मैं आ गई हूँ कनु।
और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के
कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।
कि, इस बार इतिहास बनाते समय
तुम अकेले ना छूट जाओ!
सुनो मेरे प्यार!
प्रगाढ़ केलिक्षणों में अपनी अंतरंग
सखी को तुमने बाँहों में गूँथा
पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गए प्रभु?
बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता
तुम्हारे इतिहास का
शब्द, शब्द, शब्द…
राधा के बिना
सब
रक्त के प्यासे
अर्थहीन शब्द!
सुनो मेरे प्यार!
तुम्हें मेरी ज़रूरत थी न, लो मैं सब छोड़कर आ गई हूँ
ताकि कोई यह न कहे
कि तुम्हारी अंतरंग केलिसखी
केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की
लय बन तक रह गई……
मैं आ गई हूँ प्रिय!
मेरी वेणी में अग्निपुष्प गूँथने वाली
तुम्हारी उँगलियाँ
अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथती?
तुमने मुझे पुकारा था न!
मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर
तुम्हारी प्रतीक्षा में
अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे!
---धर्मवीर भारती 
लबों से चूम लो आँखों से थाम लो मुझको
तुम्हीं से जन्मूँ तो शायद मुझे पनाह मिले..
ना जाने किस लिए उमीदवार बैठे हैं ,
इक ऐसी राह पे जो तेरी राहगुज़र भी नहीं.....फैज़ अहमद फैज़
पक गई हैं आदतें,बातों से सर होंगी नहीं ,
कोई हंगामा करो,ऐसे गुज़र होगी नहीं...दुष्यंत कुमार
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी,लेकिन आग जलनी चाहिए...दुष्यन्त कुमार

Koi muntazir hai uska kitni shiddat se FARAZ
Woh jaanta hai par anjaan bna rehta hai....
Jab Tera Dard Mere Sath Wfa Karta Hai
Ek Samandar Meri Aankhon Se Baha Karta Hai.. Faraaz
Siyaah Raat Mein Jalte Hain Jugnu Ki Tarha,
DiloN K Zakham Bhi MOHSIN Kamaal Hote Hain…!
kaun pareshan hota hai tere gam se Faraz,
woh apni hi kisi bat pe roya hoga..
Is sheher k qatil ko maine dekha to nahi,
mohsin Laashon se andaza hai k qatil pe jawani hai…mohsin
Maa Ki Lori Ka Ehsaas To Hai,
Par Maa Ko Maa Kehne Ka Waqt Nahin.
Saare Rishton Ko To Hum Maar Chuke,
Ab Unhe Dafnane Ka Bhi Waqt Nahin..
tujhe DEKHA na tha to teri ARZOO na thee,
jab se dekha TUJHE tere TALABGAAR ban gaye HUM..
Jaane kya Mujhse zamana chahta hai ,
Mera dil tod kar mujhe hasana chahta hai ,

Jaane kya baat jhalakti he mere chehre se,
Har shaks mujhe aazmana chahta hai..
Badi mushkil mein hoon,
main kaise izhaar karu,
tu to khushbu hai,
tujhe kaise giraftar karu..
Dard hi sahi mere ishq ka inaam to aaya
Khali hi sahi hathon mein jam to aaya
Mein hoon bewafa sabko bataya usne
Yun hi sahi, uske labhon pe mera naam to aaya.
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा,
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा।

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालुम है,
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।

कितनी सच्चाई से मुझसे ज़िंदगी ने कह दीया,
तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा।

मैं खुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तों,
ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जायेगा।

रूठ जाना तो मोहब्बत की अलामत है मगर,
क्या खबर थी मुझ से वो इतना खफा हो जायेगा..Bashir Badar
ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है । B. Badar
मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला.

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला.

तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला.

बहुत अजीब है ये कुर्बतों की दूरी भी
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला.

खुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने
बस एक शख्स को माँगा मुझे वो ही न मिला... Basheer Badar
yoon na jhaank gareeb ke dil mein,
Hasrtein bhi belidaas rehti hain...
jinke liye chle the safar pe,woh toh bichhud gye,
ab raaheiN kahiN bhi le chaleiN,manzil se apna koi waasta nhi..
मुसाफिर बे-खबर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मैखाने ढूँढ़ते है.
किताबों में मेरे फ़साने ढूँढ़ते है,
नादान हैं गुज़रे ज़माने ढूँढ़ते है.
Zaruri to nahi ke bataye labon se dastaan apni,
Zubaan ek aur bhi hoti hai izhaar ki.
kuchh toh baat hai k hasti mit.ti nhi,
sdiyoN rha hai dushman daur-e-zmana hmara..
fir waqt mila toh zulfeiN teri suljha doonga,
aaj uljha hooN main waqt ko suljhane mein..
Teri talab ki hadd ne, aisa junoon bakhsha hai
Hum neend se uth baithe tujhe khawab me aata Dekh ker!!

तेरी तलब की हद ने ऐसा जनून बख्शा है,
हम नींद से उठ बैठे तुझे ख्वाब में आता देख कर..
Tanha Tanha Rehta Hoon Apno Se Gairo.n Ki Tarah
Uss Ne Mahol Hii Kuch Aisa Banaa Rakha Hai.
Lamhaa Lamhaa Teri Yaadein Jo Chamak Uthtii Hain
Band Aankhon Mein Kayi Taj Mahal Jalte Hain...!
दोस्त है कच्चा पक्का सा ,
एक झूठ है आधा सच्चा सा .
जज़्बात को ढके एक पर्दा बस ,
एक बहाना है अच्छा अच्छा सा .

जीवन का एक ऐसा साथी है ,
जो दूर हो के पास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
हवा का एक सुहाना झोंका है ,
कभी नाज़ुक तो कभी तुफानो सा .
शक्ल देख कर जो नज़रें झुका ले ,
कभी अपना तो कभी बेगानों सा .

जिंदगी का एक ऐसा हमसफ़र ,
जो समंदर है , पर दिल को प्यास नहीं .
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
एक साथी जो अनकही कुछ बातें कह जाता है ,
यादों में जिसका एक धुंधला चेहरा रह जाता है .
यूँ तो उसके न होने का कुछ गम नहीं ,
पर कभी - कभी आँखों से आंसू बन के बह जाता है .

यूँ रहता तो मेरे तसव्वुर में है ,
पर इन आँखों को उसकी तलाश नहीं ...
कोई तुमसे पूछे कौन हूँ मैं ,
तुम कह देना कोई ख़ास नहीं .
 
बहुत देर है
बस के आने में
आओ
कहीं पास के लान पर बैठ जाएँ
चटखता है मेरी भी रग-रग में सूरज
बहुत देर से तुम भी चुप-चुप खड़ी हो
न मैं तुमसे वाक़िफ़
न तुम मूझसे वाक़िफ़
नई सारी बातें, नए सारे किस्से
चमकते हुए लफ़्ज, चमकीले लहज़े
फ़क़त चन्द लम्हे
न मैं अपने दु:ख-दर्द की बात छेड़ूँ
न तुम अपने घर की कहानी सुनाओ
मैं मौसम बनूँ
तुम फ़ज़ाएँ जगाओ.

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे
ਮੇਰੇ ਖੰਭਾਂ 'ਚ ਏਨੀ ਕੁ ਪਰਵਾਜ਼ ਹੈ
ਜੇ ਮੈਂ ਚਾਹਾਂ ਤਾਂ ਅੰਬਰ ਵੀ ਸਰ ਕਰ ਲਵਾਂ
ਇਹ ਨਾ ਸਮਝੀਂ ਕਿ ਉੱਡਣਾ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੀ
ਤੇਰੇ ਕਦਮਾਂ 'ਚ ਜੇ ਬਸਰ ਕਰ ਲਵਾਂ

ਕੌਣ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ ਝੱਖੜਾਂ ਤੋਂ ਡਰ ਜਾਵਾਂਗੀ
ਕੌਣ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ ਬੇਮੌਤ ਮਰ ਜਾਵਾਂਗੀ
ਜੇ ਮੈਂ ਚਾਹਾਂ ਤਾਂ ਚੰਨ ਮੇਰਾ ਗਹਿਣਾ ਬਣੇ
ਜੇ ਮੈਂ ਚਾਹਾਂ ਤਾਂ ਸੂਰਜ 'ਤੇ ਪੱਬ ਧਰ ਲਵਾਂ....Sukhwinder amrit
ਜੋ ਮਹਿਕ ਸੀ ਮਹਿਬੂਬ ਦੀ,
ਫਨਾਹ ਮੈਨੂੰ ਕਰ ਗਈ..
ਹੁਣ ਮੈਂ 'ਚ ਮੇਰਾ ਕੁਝ ਨਹੀਂ,
ਮੈਨੂੰ ਇਸ਼ਕ ਨੇ ਸ਼ਿੰਗਾਰਤਾ... Venu Gopal
ਸੁਰਾਂ ਬਾਗ਼ੀ ਨੇ,ਰਾਗਾਂ ਦੀ ਹਿਫ਼ਾਜ਼ਤ ਹੋ ਨਹੀਂ ਸਕਣੀ,
ਤੇ ਹੁਣ ਸ਼ਾਇਦ ਸਹੀ ਸੁਰ ਦੀ ਸ਼ਨਾਖ਼ਤ ਹੋ ਨਹੀਂ ਸਕਣੀ..
ਬਥੇਰਾ ਪਾ ਲਿਆ ਰੌਲਾ,ਤੂੰ ਟਿਕ ਕੇ ਬੈਠ ਜਾ ਹੁਣ ਤਾਂ,
ਕਿ ਟੁੱਟੀ ਤਾਲ ਦੀ ਤੈਥੋਂ ਮੁਰੰਮਤ ਹੋ ਨਹੀਂ ਸਕਣੀ..
ਤੂੰ ਹੱਥਾਂ ਨਾਲ਼ ਲਾਉਂਦਾ ਏਂ,ਬੁਝਾਉਂਦਾ ਨਾਲ਼ ਪੈਰਾਂ ਦੇ,
ਤੇਰੀ ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਰਲਾਵਾਂ ਹਾਂ, ਇਹ ਹਿੰਮਤ ਹੋ ਨਹੀਂ ਸਕਣੀ...somdatt dilgeer
ਮੇਰਾ ਹਰ ਦਿਨ ਦੇ ਸਿਰ ਕਰਜ਼ਾ ਹੈ,
ਮੈਂ ਹਰ ਦਿਨ ਤੋਂ ਕੁਝ ਲੈਣਾ ਹੈ..ਸ਼ਿਵ
ਤੈਨੂੰ ਮੰਜ਼ਿਲ ਦਾ, ਮੈਨੂੰ ਰਾਹਾਂ ਦਾ,
ਤੈਨੂੰ ਹਾਸੇ ਦਾ, ਮੈਨੂੰ ਧਾਹਾਂ ਦਾ,
ਤੈਨੂੰ ਚਾਨਣ ਦਾ, ਮੈਨੂੰ ਹਨੇਰੇ ਦਾ,
ਤੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਦਾ, ਮੈਨੂੰ ਤੇਰੇ ਦਾ,
ਸਾਡੇ ਵੱਖੋ ਵੱਖਰੇ ਮਸਲੇ ਨੇ...
ਮੈਂ ਸੁੱਕੀ ਰੇਤ ਉੱਤੇ
ਤੇਰੇ ਨਾਂ ਦੇ ਕੁਝ
ਮਲੂਕ ਅਖ੍ਹਰ ਲਿਖਦਾ ਹਾਂ
ਤਾਂ ਹਵਾ ਇਕ ਪਾਗਲ ਬੁੱਲਾ
ਕੋਸ਼ਿਸ ਕਰਦਾ ਏ
ਉਸਨੂੰ ਪੜ੍ਹਨ ਦੀ
ਪੂਰੇ ਜ਼ੋਰ ਨਾਲ .. Balvinder singh
ਮੈਨੂੰ ਅੰਤਾਂ ਦੀ ਤੇਹ ਹੈ ਤੇ
ਮੈਂ ਬਾਰਿਸ਼ ਦੇ ਮਜ਼ਮੂਨ ਉਤੇ
ਕੱਕੀ ਰੇਤ ਨਾਲ
ਸੰਵਾਦ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ,
ਰੇਤ ਖੁਸ਼ ਹੈ
ਕਿ ਉਸ ਵਰਗਾ
ਇਕ ਹੋਰ ਵੀ ਹਮਖਿਆਲ ਹੈ
ਇਹਨਾਂ ਤੱਪਦੇ ਥੱਲਾਂ ਅੰਦਰ ..Balvinder singh
ਪਹਿਲਾਂ ਤਰਾਸ਼ਿਆ ਜਿਸਨੂੰ, ਫੇਰ ਮੈਂ ਤਰਸਿਆ ਉਸਨੂੰ
ਅਜੀਬ ਜਿਹਾ ਜੌਹਰੀ ਹਾਂ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਹੀ ਹੀਰਿਆਂ ਦਾ ...Balvinder singh
ਹਰ ਮੇਰਾ ਨਗ਼ਮਾ ਜਿਵੇਂ,
ਮੈਂ ਖ਼ਤ ਕੋਈ ਲਿਖਦੀ ਰਹੀ...
ਹੈਰਾਨ ਹਾਂ,ਇੱਕ ਸਤਰ ਵੀ ਤੇਰੇ ਤੱਕ ਪੁੱਜਦੀ ਨਹੀਂ.?? Amrita Pritam
ਇਸ਼ਕ ਨੂੰ ਆਦਤ ਨਾ ਪਾਉ ਬੋਲਣ ਦੀ,
ਅਜੇ ਤੱਕ ਤਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਕੰਨਾਂ ਨੂੰ ਸੁਣਨ ਦੀ ਜਾਂਚ ਨਹੀਂ ਆਈ,
ਲਫ਼ਜ਼ਾਂ ਦੀ ਦੌਲਤ ਬਿਨਾਂ ਵੀ ਵਫ਼ਾ ਹੈ ਅਮੀਰ.. Amrita Pritam
ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਖ਼ਾਬ ਲੁੱਟ ਜਾਵਣ,ਨਜ਼ਰ ਗਾਉਂਦੀ ਰਹੇ ਫ਼ੇਰ ਵੀ...
ਦਿਲ ਜੇ ਸਲਾਮਤ ਹੈ ਤਾਂ,ਧੜਕਣ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਲੱਭ ਲਵੇਗਾ..

Monday, January 30, 2012

ਨਜ਼ਰ ਮਿਲਾਉਂਦੇ ਹੀ ਕਿਉਂ ਉਹ ਚਿਹਰੇ ਏਨੇ ਸਾਧਾਰਨ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਨੇ,
ਜਿੰਨਾਂ ਦੀ ਗ਼ੈਰ ਹਾਜ਼ਰੀ ਨੇ ਸਿਰਜੇ ਹੁੰਦੇ ਨੇ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਲਿਸ਼ਰਦੇ ਪੁਸ਼ਕਦੇ ਸ਼ਬਦ..
कुछ ख़्वाबों के ख़त इसमें, कुछ चाँद के आईने,सूरज की शुआएं हैं, नज़मों में कुछ मेरे अपने तजुर्बे हैं, कुछ मेरी दुआएं हैं...
निकलोगे सफ़र पे जब ये साथ में रख लेना, शायद कहीं काम आए...