मेरे कपड़ों में टंगा है तेरा ख़ुशरंग लिबास
घर पे धोता हूँ मैं हर बार उसे , और सुखा के फिर से ,
अपने हाथों से उसे इस्त्री करता हूँ मगर,
इस्त्री करने से जाती नहीं शिकनें उसकी,
और धोने से गिले-शिकवों के चकते नहीं मिटते!
ज़िन्दगी किस कदर आसां होती
रिश्ते गर होते लिबास -
और बदल लेते कमीज़ों की तरह..
घर पे धोता हूँ मैं हर बार उसे , और सुखा के फिर से ,
अपने हाथों से उसे इस्त्री करता हूँ मगर,
इस्त्री करने से जाती नहीं शिकनें उसकी,
और धोने से गिले-शिकवों के चकते नहीं मिटते!
ज़िन्दगी किस कदर आसां होती
रिश्ते गर होते लिबास -
और बदल लेते कमीज़ों की तरह..
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