भाई,
मुझमें-तुममें नामानिगारी काहे को है, मकालमा है। आज सुबह को एक ख़त भेज चुका हूँ, अब इस वक्त तुम्हारा ख़त और आया। सुनो, साहिब, लफ्ज मुबालक 'मीम, हा, मीम, दाल' इसके हर हरफ़ पर मेरी जान निसार है। मगर चूँकि यहाँ से विलायत तक हुक्काम के हाँ से यह लफ्ज, यानी 'मुहम्मद असदुल्ला खाँ' नहीं लिखा जाता, मैंने भी मौकूफ कर दिया है।
रहा 'मिर्जा' व 'मौलाना' व 'नवाब', इसमें तुमको और भाई को इख्तियार है, जो चाहो सो लिखो। भाई को कहना, उनके खत का जवाब सुबह को रवाना कर चुका हूँ। मिर्जा तफ्ता, अब तुम तज़ईन-ए-जिल्दहा-ए-किताब के बाब में बरादरज़ादा सआ़दतमंद क तकलीफ़ न दो। मौलाना मेहर को इख्तियार है, जो चाहें सो करें।
ख़त तमाम करके ख्याल में आया कि वह जो मिर्जा साहिब से मुझको मतलूब है, तुम पर भी जाहिर करूँ। साहिब, वहाँ एक अख़बार मोसूम ब 'आफ़ताब-ए-आलमताब' निकलता है। उसके महतमिम ने इल्तजा़म किया है कि एक सफ्हा या डेढ़ सफ्हा बादशाह-ए-दिल्ली के हालात का लिखता है, नहीं मालूम, आगा़ज़ किस महीने से है।
मुझमें-तुममें नामानिगारी काहे को है, मकालमा है। आज सुबह को एक ख़त भेज चुका हूँ, अब इस वक्त तुम्हारा ख़त और आया। सुनो, साहिब, लफ्ज मुबालक 'मीम, हा, मीम, दाल' इसके हर हरफ़ पर मेरी जान निसार है। मगर चूँकि यहाँ से विलायत तक हुक्काम के हाँ से यह लफ्ज, यानी 'मुहम्मद असदुल्ला खाँ' नहीं लिखा जाता, मैंने भी मौकूफ कर दिया है।
रहा 'मिर्जा' व 'मौलाना' व 'नवाब', इसमें तुमको और भाई को इख्तियार है, जो चाहो सो लिखो। भाई को कहना, उनके खत का जवाब सुबह को रवाना कर चुका हूँ। मिर्जा तफ्ता, अब तुम तज़ईन-ए-जिल्दहा-ए-किताब के बाब में बरादरज़ादा सआ़दतमंद क तकलीफ़ न दो। मौलाना मेहर को इख्तियार है, जो चाहें सो करें।
ख़त तमाम करके ख्याल में आया कि वह जो मिर्जा साहिब से मुझको मतलूब है, तुम पर भी जाहिर करूँ। साहिब, वहाँ एक अख़बार मोसूम ब 'आफ़ताब-ए-आलमताब' निकलता है। उसके महतमिम ने इल्तजा़म किया है कि एक सफ्हा या डेढ़ सफ्हा बादशाह-ए-दिल्ली के हालात का लिखता है, नहीं मालूम, आगा़ज़ किस महीने से है।
|
|||
|
|
|||
No comments:
Post a Comment