Monday, March 19, 2012

ग़ालिब का ख़त-43

अंदोह-ए-फ़िराक़ ने वो फ़शार दिया कि जौहर-ए-रूह गुदाज़ पाकर हर बुन-ए-मू से टपक गया। अगर आपके इक़बाल की ताईद न होती, तोदिल्ली तक मेरा‍ ज़िंदा पहुँचना मुहाल था।
जाड़ा, मेह, कब्ज़-ओ-इनक़िबाज़, फुक़दान-ए-जूअ, फ़ाक़ाहाए मुतवातिर, मंजिलहाए नामानूस, हापुड तक आफ़ताब का नजर न आनाल शब-ओ-रोज़ हवाए ज़महरीर का जांगुज़ा रहना, बारे हापुड़ से चलकर नय्यर-ए-आज़म की सूरत दिखाई दी। धूप खाता हुआ दिल्ली पहुँचा। एक हफ़्ता कोफ़्ता-ओ-रंजूर रहा। अब वैसा पीर व नातवान हूँ, जैसा कि इस सफ़र से पहले था ख़ुदा वो दिन करे कि फिर उस दर पर पहुँचुँ -
तुम सलामत रहो हज़ार बरस।
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार।
निजात का तालिब,
ग़ालिब
21
जनवरी 1866

ग़ालिब का ख़त-42

युसूफ मिर्जा़, 
क्यों कर तुझको लिखूँ कि तेरा बाप मर गया और अगर लिखूँ तो फिर आगे क्या लिखूँ कि अब क्या करो। मगर सब्र वह एक शेवा-ए-फ़र्सूदा इब्नाए रोजगार का है। ताजियत यूँ ही किया करते हैं और यही कहा करते हैं कि सब्र करो। हाय, एक का कॉलेज कट गया है और लोग उसे कहते हैं कि ू न तड़पभलक्योंकर न तड़पेगा। सलाह इस अमर में नहीं बताई जाती। दुआ को दखल नहीं। दवा का लगाव नहीं।
पहलबेटमरा, फिर बाप मरा। मुझसे अगर कोई पूछे कि बे-सर-ओ-पा किसको कहते हैं तो मैं कहूँगा कि युसूफ मिर्जा़ को। तुम्हारी दादी लिखती हैं कि रिहाई का हुक्म हो चुका था, यह बात सच है।
अगजवांमर्द एक बार दोनों क़ैदों से छूट गया। न क़ैद-ए-हयात रही, न क़ैद-ए-तिरंगा। हाँ तजहीज़-ओ-तकफ़ीन के काम आए। यह क्या बात है जो मुजरिम होकर चौदह बरस को मुक़य्यद हुआ हो, उसकी पेंशन क्योंकर मिलेगी और किसकी दरख्वास्त समिलेगी।
रसीद किससे ली जाएगी। मुस्तफ़ा ख़ाँ की रिहाई का हुक्म हुआ, गर पेंशन जब्त। हरचंद इस पुरसिश से कुछ हासिनहीं।

ग़ालिब का ख़त-41

मियाँ, 

तुम्हारा ख़त रामपुर पहुँचा और रामपुर से दिल्ली आया। मैं 23 शाबान को रामपुर से चला और 30 शाबान को दिल्ली पहुँचा। उसी दिन चाँद हुआ। यक शंबा रमज़ान की पहली, आज दो शंबा 9 रमज़ान की है। सो नवां दिन मुझे यहाँ आए हुए है। मैंने हुसैन मिर्जा़ साहिब को रामपुर से लिखा था कि यूसुफ़ मिर्जा़ को मेरे अलवर तक न जाने देना। अब उनकी ज़बानी मालूम हुआ कि वह मेरा ख़त उनको तुम्हारी रवानगी के बाद पहुँचा।
जो मुझको अपने मामू के मुक़द्दमे में लिखते हो, क्या मुझको उनके हाल से ग़ाफिल और उनकी फिक्र से फा़रिग़ जानते हो? कुछ बिना डाल आया हूँ। अगर ख़ुदा चाहे तो कोई सूरत निकल आए। अब तुम कहो कि कब तक आओगे। सिर्फ़ तुम्हारे देखने को नहीं कहता। शायद तुम्हारे आने पर कुछ काम भी किया जाए। मुज़फ़्फ़र मिर्जा़ का और अमशीरा साहिबा का आना, तो कुछ जरूर नहीं, शायद आगे बढ़कर कुछ हाजत पड़े। बहरहाल, जो होगा वह समझ लिया जाएगा। तुम चले आओ। हमशीरा अज़ीज़ा को मेरी दुआ़ कह देना। मुज़फ़्फ़र मिर्जा़ को दुआ़ पहुँचे।
भाई तुम्हार ख़त रामपुर पहुँचा। इधर के चलने की फिक्र में जवाब न लिख सका। बख़्शी साहिबों का हाल यह है कि आग़ा सुलतान पंजाब को गए, जगराऊँ में मुंशी रज्जब अ़ली के मेहमान हैं। सफ़दर सुलतान और यूसुफ सुलतान वहाँ हैं। नवाब मेहदी अ़ली खा, ब-क़दर-ए-क़लील बल्कि अक़ल कुछ उनकी ख़बर लेते हैं। मीर जलालुद्दीन ख़ुशनवीस और वे दोनों भाई बाहम रहते हैं। मैं वहीं था कि सफ़दर सुल्तान दिल्ली को आए थे।
अब जो मैं यहाँ आया तो सुना कि वे मेरठ गए। ख़ुदा जाने, रामपुर जाएँ या किसी और तरफ़ का क़स्द करें। तबाही है, क़हर-ए-इलाही है। मुझको लड़कों ने बहुत तंग किया। वरना चंद रोज़ और रामपुर में रहता। ज़्यादा क्या लिखूँ।

2
अप्रैल 1860 रा‍क़िम,
ग़ालिब

ग़ालिब का ख़त-40

यूसुफ़ मिर्जा़,

मेरा हाल सिवाय मेरे ख़ुदा और ख़ुदाबंद के कोई नहीं जानता। आदमी कसरत-ए-ग़म से सौदाई हो जाते हैं, अक़्‍ल जाती रहती है। अगर इस हजूम-ए-ग़म में मेरी कुव्वत मुतफ़क्रा में फ़र्क आ गया हो तो क्या अजब है? बल्कि इसका बावर न करना ग़ज़ब है। पूछो कि ग़म क्या है?
ग़म-ए-मर्ग, ग़म-ए-‍फ़िराक़, ग़म-ए-रिज़्क, ग़म-ए-इज्ज़त? ग़म-ए-मर्ग में क़िलआ़ नामुबारक से क़ताअ़ नज़र करके, अहल-ए-शहर को गिनता हूँ। मुज़फ़्फ़रुद्दौला, मीर नसरुद्दीन, मिर्जा़ आ़शूर बेग मेरा भाजना, उसका बेटा अहमद मिर्जा़ उनईनस बरस का बच्चा, मु्स्तफ़ा ख़ाँ, क़ाज़ी फ़ैज़ उल्ला, क्या मैं उनको अपने अज़ीज़ों के बराबर नहीं जानता। ए लो, भूल गया। हकीम रज़ीउद्दीन ख़ाँ, मीर अहमद हुसैन मैकश! अल्ला-अल्ला उनको कहाँ से लाऊँ? ग़म-ए-फ़िराक़, हुसैन मिर्जा़, यूसुफ़ मिर्जा़, मीर मेहदी, मीर सरफ़राज हुसैन, मीरन साहिब, ख़ुदा इनको जीता रखे।
काश, यह होता कि जहाँ होते, वहाँ खुश होते। घर उनके बेचिराग़, वह खुद आवारा। सज्जाद और अकबर के हाल तक जब तसव्वुर करता हूँ, कलेजा टुकड़े-टुकड़े होता है। कहने को हर कोई ऐसा कह सकता है़, मगर मैं अ़ली को गवाह करके कहता हूँ कि उन अमावत के ग़म में और ज़ंदों के ‍फ़िराक़ में आ़लम मेरी नज़र में तीर-ओ-तार है। हक़ीक़ी मेरा एक भाई दीवाना मर गया। उसकी बेटी, उसके चार बच्चे, उनकी माँ, यानी मेरी भावज जयपुर में पड़े हुए हैं। इन तीन बरस में एक रुपया उनको नहीं भेजा। भतीजी क्या कहती होगी कि मेरा भी कोई चच्चा है। यहाँ अग़निया और उमरा के अज़दवाज व औलाद भीख माँगते फिरें और मैं देखूँ।
इस मुसीबत की ताब लाने को जिगर चाहिए। अब ख़ास दुख रोता हूँ। एक बीवी, दो बच्चे, तीन-चार आदमी घर के, कल्लू, कल्यान, अय्याज़ ये बाहर। मदारी के जोरू-बच्चे बदस्तूर, गोया मदारी मौजूद है। मियाँ घम्मन गए गए महीना भर से आ गए कि भूखा मरता हूँ। अच्छा भाई, तुम भी रहो। एक पैसे की आमद नहीं। बीस आदमी रोटी खाने वाले मौजूद। मेहनत वह है कि दिन-रात में फुर्सत काम से कम होती है। हमेशा एक फिक्र बराबर चली जाती है। आदमी हूँ, देव नहीं, भूत नहीं।
इन रंजों का तहम्मुल क्योंकर करूँ? बुढ़ापा, जोफ़-ए-क़वा, अब मुझे देखो तो जानो कि मेरा क्या रंग है। शायद कोई दो-चार घड़ी बैठता हूँ, वरना पड़ा रहता हूँ, गोया साहिब-ए-फ़राश हूँ, न कहीं जाने का ठिकाना, न कोई मेरे पास आने वाला। वह अ़र्क जो ब-क़द्र-ए-ताक़त, बनाए रखता था, अब मुयस्सर नहीं।
सबसे बढ़कर, आमद आमद-ए-गवर्नमेंट का हंगामा है। दरबार में जाता था, ख़लह-ए-फ़ाख़िरा पाता था। वह सूरत अब नज़र नहीं आती। न मक़बूल हूँ, न मरदूद हूँ, न बेगुनाह हूँ, न गुनहगार हूँ, न मुख़बिर, न मुफ़सिद, भला अब तुम ही कहो कि अगर यहाँ दरबार हुआ और मैं बुलाया जाऊँ त नज़र कहाँ से लाऊँ। दो महीने दिन-रात खन-ए-जिगर खाया और एक क़सीदा चौंसठ बैत का लिखा। मुहम्मद फ़ज़ल मुसव्विर को दे दिया, वह पहली दिसंबर को मुझे दे देगा।
 
मियाँ, हम तुम्हें एक और ख़बर लिखते हैं, ब्रह्मा का पुत्र दो दिन बीमार पड़ा, तीसरे दिन मर गया। हाय, हाय क्या नेक बख़्त गरीब लड़का था। बाप उसका शिवजी राम, उसके ग़म में मुर्दे से बदतर है। यह दो मुसाहिब मेरे यूँ गए, एक मुर्दा, एक दिल अफ़सुर्दा कौन है जिसको तुम्हारा सलाम कहूँ? यह ख़त अपने मामू साहब को पढ़ा देना और फ़र्द उनसे लेकर पढ़ लेना और जिस तरह उनकी राय में आए, उस पर हसूल-ए-मतलिब की बिना उठाना, और इन सब मदारिज का जवाब शिताब लिखना। जि़याउद्दीन ख़ाँ रोहतक चले गए और वह काम न कर गए।
देखिए, आकर क्या कहते हैं। या रात को आ गए हों या शाम तक आ जाएँ। क्या करूँ? किसके दिल में अपना दिल डालूँ? ब मुर्तज़ा अली। पहले से नीयत में यह है कि जो शाह-ए-अवध से हाथ आए, हिस्सा ब्रादराना करूँ-निस्फ़ : हुसैन मिर्जा़ और तुम सज्ज़ाद, निस्फ़ : में मुफ़लिसों का मदार-ए-हयात ख़यालात पर है। मगर उसी ख़यालात से उनका हुस्न-ए-तबीत मालूम हो जाता है।

ग़ालिब का ख़त-39

पीर-ओ-मुर्शिद,

12 बजे थे, मैं अपने पलंग पर लेटा हुआ हुक्क़ा पी रहा था कि आदमी ने आकर ख़त दिया। मैंने खोला, पढ़ा। भले को अंगरखा या कुरता गले में न था। अगर होता तो मैं गरेबान फाड़ डालता। हज़रत का क्या जाता? मेरा नुक़सान होता। सिरे से सुनिए। आपका क़सीदा बाद-ए-इस्लाह भेजा। उसकी रसीद आई। कई कटे हुए शेर उल्टे आए, उनकी क़बाहरत पूछी गई, क़बाहत बताई गई।
अल्फ़ाज़ क़बीह की जगह बे ऐब अल्फ़ाज लिख दिए गए। लो साहिब, ये अशआ़र भी क़सीदे में लिख लो। इस निगारिश का जवाब आज तक नहीं आया। शाह इसरारुलहक़ के नाम का कागज़ उनको दिया। जवाब में जो कुछ उन्होंने ज़बानी फरमाया, आपको लिखा गया। हज़रत की तरफ़ से इस तरह का भी जवाब न मिला।
पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ, राग से जैसे बाजा
इक ज़रा छेड़िए, फिर देखिए क्या होता है।



सोचता हूँ कि दोनों ख़त बैरंग गए थे, तलफ़ होना किसी तरह मुतसव्वर नहीं। ख़ैर, अब बहुत दिन के बाद शिकवा क्या लिखा जाए। बासी कढ़ी में उबाल क्यों आए। बंदगी बेचारगी।
पाँच लश्कर का हमला पै दर पै इस शहर पर हुआ। पहला बाग़ियों का लश्कर, उसमें पहले शहर का एतबार लुटा। दूसरा लश्कर ख़ाकियों का, उसमें जान-ओ-माल-नामूस व मकान व मकीन व आसमान व ज़मीन व आसार-ए-हस्ती सरासर लुट गए। तीसरा लश्कर का, उसमें हज़ारहा आदमी भूखे मरे।
चौथा लश्कर हैज़े का, उसमें बहुत-से पेट भरे मरे। पाँचवाँ लश्कर तप का, उसमें ताब व ताक़त अ़मूमन लुट गई। मरे आदमी कम, लेकिन जिसको तप आई, उसने फिर आज़ा में ताक़त न पाई। अब तक इस लश्कर ने शहर से कूच नहीं किया।
मेरे घर में दो आदमी तप में मुब्तिला हैं, एक बड़ा लड़का और एक मेरा दरोग़ा। ख़ुदा इन दोनों को जल्द सेहत दे। बरसात यहाँ भी अच्छी हुई है, लेकिन न ऐसी कि जैसी काल्पी और बनारस में। ज़मींदार खुश, खेतियाँ तैयार हैं। ख़रीफ़ का बेड़ा पार है। रबीअ़ के वास्ते पोह मन में मेंह दरकार है। किताब का पार्सल परसों इरसाल किया जाएगा।



























ग़ालिब का ख़त-38

नवाब अनवरुद्दौला सआ़दुद्दीन ख़ाँ बहादुर शफ़क़
पीर-ओ-मुर्शिद,

क्या हुक्म होता है? अहमक़ बनकर चुप रहूँ या जो अज़-रूए-क़शफ़-ए-यक़ीनी मुझ पर हाली हुआ है वह कहूँ? अव्वल रज्जब में नवाज़िशनामा आपने कब भेजा? आख़िर मेरे पास पहुँच ही गया। जवाब भेजा अगर रवाना हुआ होता तो वह भी पहुँच गया होता। बहरहाल, मुहब्बत की गर्मी-ए-हंगामा है। यह जुमला महज़ आरायश-ए-उनवान-ए-नामा है :
उमरत दराज़ बाद के ईं हम ग़नीमत अस्त
पेंशनदारों का इजराए पेंशन, और अहल-ए-शहर की आबादी मसकन, यहाँ उस सूरत पर नहीं है, जैसी और कहीं है। और जगह सियासत है कि मिंजुमला ज़रूरियात-ए-रियासत है, यहाँ क़हर-ए-इलाही है कि मंशा-ए-तबाही है। खास मेरे बाब में गवर्नमेंट से रिपोर्ट तलब हुई है। इबना-ए-रोज़गार हैरान हैं कि यह भी एक बात अजब हुई है।
रिपोर्ट की रवानगी की देर है, चंद रोज़ और भी क़िस्मत का फेर है। दिल्ली इलाक़ा लेफ्‍टिनेंट गवर्नर से इंकताअ़ पा गई और तहत-ए-हु इहाता पंजाब के तहत-ए-हुकूमत आ गई। रिपोर्ट यहाँ से लाहौर और लाहौर और लाहौर से कलकत्ता जाएगी। और इसी तरहफेर खाकर नवीद-ए-हुक्म मंजूरी आएगी।
9
मार्च 1859 ई. अर्ज़दाश्त,
ग़ालिब

ग़ालिब का ख़त-37

हज़रत, बहुत दिनों में आपने मुझको याद किया। साल-ए-गुज़श्ता इन दिनों में मैं रामपुर था। मार्च सन् 1860 में यहाँ आ गया हूँ, अब यहीं मैंने आपका ख़त पाया था, आपने सरनामे पर रामपर का नाम नाहक़ लिखा। हक़ तआ़ला वली-ए-रामपुर को सद-ओ-सी साल सलामत रखे, उनका अ़त़िया माह ब-माह मुझको पहुँचता है। कर्म गुस्तरी व उस्ताद परवरी कर रहे हैं। मेरे रंज-ए-सफ़र उठाने की और रामपुर जाने की हाजत नहीं।
मौलवी अहमद हसन अ़र्शी को फ़िराक़ को मैं नहीं समझा कि क्यों वाक़े हुआ, बल्कि यह भी नहीं मालूम कि आप और वह यकजा कहाँ थे और कब थे? ख़लीफ़ा हुसैन अ़ली साहिब रामपुर में मुझसे मिले होंगे, मगर वल्लाह, मुझको याद नहीं। निसयान का मर्ज़ लाहक़ है। हाफ़िया हाफ़िज़ा गोया न रहा।
22 फ़रवरी 1861 ई.
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जनाब क़ाज़ी साहिब को मेरी बंदगी पहुँचे।
मुकरीम मौलवी गुलाम ग़ौस ख़ाँ बहादुर मीर मुंशी का क़ौल सच है। अब मैं तंदुरुस्त हूँ। फोड़ा-फुंसी, ज़ख्‍म जर्रहत, कहीं नहीं। मगर ज़ौफ़ की वह शिद्दत है कि खुदा की पनाह-जही़फ़ क्योकर न हो। बरस दिन साहिब-ए-फ़राश रहा हूँ। सत्तर बरस की उम्र। जितना ख़ून बदन में था, बेमुबालग़ा आधा उसमें से पीप होकर निकल गया।
सिन-ए-नमू कहाँ, जो अब फिर तोलीद-ए-दम-ए-सालेह को? बहरहाल, ज़िंदा हूँ और नातवाँ और आपकी पुरसिशहा-ए-दोस्ताना का ममनून-ए-अहसान।

30 नवंबर 1863 जिनात का तालिब़
ग़ालिब

ग़ालिब का ख़त-36

बरखुरदार मुंशी जवाहरसिंह को बाद दुआ़-ए-दवाम उम्र-ओ-दौलत मालूम हो। ख़त तुम्हारा पहुँचा। ख़ैर-ओ-आ़फि़यत तुम्हारी मालूम हुई। क़तए जो तुमको मतलब थे उसके हसूल में जो कोशिश हीरासिंह ने की है, मैं तुमसे कह नहीं सकता। निरी कोशिश नहीं, रुपया ‍सर्फ़ किया। पंद्रह रुपया जो तुमने भेजे थे वह और पच्चीस-तीस रुपया सर्फ़ किए। पाँच-पाँच और चार-चार रुपया जुदा दिए और बनवाने में रुपया जुदा लगाए। दौड़ता फिरा हकीम साहिब पास कई बार जाके हज़ूरवाला का क़त्आ़ आया।

अब दौड़ रहा है वली अ़हद बहादुर के दस्तख़ती क़त्ए के वास्ते। यक़ीन है‍ कि दो-चार दिन में वह भी हाथ आवे और बाद इस क़त्आ़ को आने के बाद वह सबको यकजा करके तुम्हारे पास भेज देगा। मदद में भी उसकी कर रहा हूँ लेकिन उसने बड़ी मुशक्क़त की। आफरीं सद्‍ आफरीं। पंद्रह रुपए में से एक रुपया अपने सर्फ़ में नहीं लाया। और माँ को आ़ज़िज़ करके उससे बहुत रुपए मिले। जब सब कत्ए तुम्हारे पास पहुँचें, तब उसका हुस्न-ए-‍ख़िदमत तुम पर ज़ाहिर होगा। क्यों साहिब वह हमारी लुंगी अब तक क्यों नहीं आई। बहुत दिन हुए जब तुमने लिखा था कि इसी हफ़्ते भेजूँगा।
असदुल्ला
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क़ाज़ी अब्दुलजमील जुनून
मख़दूम-ए-मुकर्रम व मुअ़ज़्ज़म जनाब मौलवी अब्दुलजमील साहिब की ख़िदमत में बाद इबलाग़-ए-सलाम-ए-मसलून उल इस्लाम अर्ज़ किया जाता है।
मुशाअ़रा यहाँ शहर में कहीं न होता। क़िला में शहज़ादगान-ए-तैमूरिया जमा होकर कुछ ग़ज़ल लिखकर कहाँ पढ़िएगा। मैं कभी उस महफ़िल में जाता हूँ और कभी नहीं जाता। और यह सोहबत खुद दंज रोज़ा है। इसको दवाम कहाँ? क्या मालूम है अब ही न हो, अब के हो तो आइंदा न हो।

1845 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-35

मुंशी जवाहरसिंह जौहर

बरख़ुरदार, कामगार, सआ़दत-इक़बाल निशान मुंशी जवाहरसिंह जौहर को बल्लभगढ़ की तहसीलदारी मुबारक हो। 'पीपली' से 'नूह' आए। 'नूह' से 'बल्लभगढ़ गए? अब 'बल्लभगढ़' से  आओगे, इंशा अल्लाह। सुनो साहिब, हकीम मिर्जा़ जान ख़लफुलसिद्‍क हकीम आगा जान साहिब के, तुम्हारे इलाक़ा-ए-तहसीलदारी में ब-सीग़ा-ए-तबाबत मुला‍ज़िम सरकार अँग्रेजी हैं। इनके वालिद माजिद मेरे पचास बरस के दोस्त हैं। उनको अपने भाई के बराबर जानता हूँ। इस सूरत में हकीम मिर्जा़ जान मेरे भतीजे और तुम्हारे भाई हुए।
लाज़िम है कि उनसे यक दिल व यक रंग रहो। और उनके मददगार बने रहो। सरकार से यह ओ़दा ब सीग़-ए-दवाम है़, तुमको कोई नई बात पेश करनी न होगी। सिर्फ़ इसी उम्र में कोशिश रहे कि दिल्ली सूरत अच्छी बनी रहे। सरकार के ख़ातिर निशान रहे कि हकीम मिर्जा़ जान होशियार और कारगुज़ार आदमी है।

2
फरवरी 1864 ई.
ग़ालिब
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बरखुरदार मुंशी जवाहरसिंह को बाद दुआ़-ए-दवाम उम्र-ओ-दौलत मालूम हो। ख़त तुम्हारा पहुँचा। ख़ैर-ओ-आ़फि़यत तुम्हारी मालूम हुई। क़तए जो तुमको मतलब थे उसके हसूल में जो कोशिश हीरासिंह ने की है, मैं तुमसे कह नहीं सकता। निरी कोशिश नहीं, रुपया ‍सर्फ़ किया। पंद्रह रुपया जो तुमने भेजे थे वह और पच्चीस-तीस रुपया सर्फ़ किए। पाँच-पाँच और चार-चार रुपया जुदा दिए और बनवाने में रुपया जुदा लगाए। दौड़ता फिरा हकीम साहिब पास कई बार जाके हज़ूरवाला का क़त्आ़ आया।
अब दौड़ रहा है वली अ़हद बहादुर के दस्तख़ती क़त्ए के वास्ते। यक़ीन है‍ कि दो-चार दिन में वह भी हाथ आवे और बाद इस क़त्आ़ को आने के बाद वह सबको यकजा करके तुम्हारे पास भेज देगा। मदद मैं भी उसकी कर रहा हूँ लेकिन उसने बड़ी मुशक्क़त की। आफरीं सद्‍ आफरीं।
पंद्रह रुपए में से एक रुपया अपने सर्फ़ में नहीं लाया। और माँ को आ़ज़िज़ करके उससे बहुत रुपए मिले। जब सब कत्ए तुम्हारे पास पहुँचें, तब उसका हुस्न-ए-‍ख़िदमत तुम पर ज़ाहिर होगा। क्यों साहिब वह हमारी लुंगी अब तक क्यों नहीं आई। बहुत दिन हुए जब तुमने लिखा था कि इसी हफ़्ते भेजूँगा। असदुल्ला

गालिब का ख़त-34

भाई साहिब,

शुक्र है ख़ुदा का कि तुम्हारी ख़ैर-ओ-आ़फ़ियत मालूम हुई। तुम भी ख़ुदा का शुक्र बजा लाओ कि मेरे यहाँ भी इस वक़्त तक ख़ैरियत है। दोनों लड़के खुश हैं। आम-आम करते फिरते हैं। कोई उनको नहीं देता। उनकी दादी को यह वहम है कि पेट-भर उनको खाने नहीं देती।
यह तुमको याद रहे कि वली अह़द के मरने से कुछ पर बड़ी मुसीबत आई। बस अब मुझको इस सल्तनत से ताल्लुक बादशाह के दम तक है। ख़ुदा जाने कौन वली अह़द होगा। मेरा क़द्र-शनास मर गया। अब मुझको कौन पहचानेगा? अपने आफ़रीदगार पर तकिया किए बैठा हूँ। सर-ए-दस्त ये नुक़सान कि वे ज़ैनउलआबदीन ख़ाँ के दोनों बेटों को मेवा खाने को दस रुपए महीना देते थे। अब वह कौन देगा?
दो दिन से शिद्दत-ए-हवाए-वबाई कम है-मेंह भी बरसता है। हवा ठंडी चलती है। इंशा अल्लाह तआ़ला बक़िया आशोब भी रफ़अ़ हो जाएगा। तुम अपने शहर का हाल लिखो और बच्चों की ख़ैर-ओ-आ़फियत भेजो।
जब तक यह हवा है, हर यक शंबा को ख़त लिखा करो। मैं भी ऐसा ही करूँगा कि हर हफ़्ता मैं तुमको ख़त लिखता रहूँगा। मुंशी अब़्दुल लतीफ़ को मेरी दुआ़ कहो और यह कहो कि क्यों साहिब, मेरठ से और कोल से कभी हमको ख़त न लिखा। बाक़ी और सब लड़कों को, लड़कियों को दुआ़ कह देना। बेगम को ख़सूसन।

27 जुलाई 1856 ई.
ग़ालिब 

ग़ालिब का ख़त-33

भाई साहिब,
मेंह का यह आलम है कि जिधर देखिए, उधर दरिया है। आफ़ताब का नज़र आना बर्क़ का चमकना है, यानी गाहे दिखाई दे जाता है। शहर में मकान बहुत गिरते हैं। इस वक़्त भी मेंह बरस रहा है। ख़त लिखता तो हूँ, मगर देखिए डाकघर कब जावे। कहार को कमल उढ़ाकर भेज दूँगा।
आम अब के साल ऐसे तबाह हैं कि अगर बमुश्किल कोई शख़्स दरख़्त पर चढ़े और टहनी से तोड़कर वहीं बैठकर खाए, तो भी सड़ा हुआ और गला हुआ पाए। यह त सब कुछ है, मगर तुमको तफ़्ता की भी कुछ ख़बर है। पितंबर सिंह उसका लाडला बेटा मर गया। हाय, उस ग़रीब के दिल पर क्या गुज़री होगी।
तुम अब ख़त लिखने में बहुत देर करते हो। आठवें दिन अगर एक ख़त लिखते रहो, तो ऐसा क्या मुश्किल है! यहाँ दोनों लड़के अच्छी तरह हैं। अब वहाँ के लड़कों की ख़ैर-ओ-आ़फ़ियत लिखिए।

26 जुलाई 1855 ई. असद

ग़ालिब का ख़त-32

लो साहिब! और तमाशा सुनो। आप मुझको समझाते हैं कि तफ़्ता को आजुर्दा न करो। मैं तो उनके ख़त के न आने से डरा था कि कहीं मुझसे आजुर्दा न हों। बारे जब तुमको लिखा और तुमने ब-आईन-ए-मुनासिब उनको इत्तिला दी, तो उन्होंने मु्‍झको ख़त लिखा।
चुनांचे परसों मैंने उसे ख़त का जवाब भेज दिया। तुम्हारी इनायत से वह जो एक अंदेशा था, रफ़अ हो गया। ख़ातिर मेरी जमा हो गई। अब कौन-सा किस्सा बाक़ी रहा कि जिसके वास्ते आप उनकी सिफ़ारिश करते हैं। वल्लाह, तफ़्ता को मैं अपने फ़र्जन्द की जगह समझता हूँ। और मुझको नाज़ है कि ख़ुदा ने मुझको ऐसा क़ाबिल फ़र्जन्द अ़ता किया है। रहा दीबाचा, तुमको मेरी ख़बर ही नहीं।
मैं अपनी जान से मरता हूँ -
गया हो अपना जेवड़ा ही निकल
कहाँ की रुबाई, कहाँ की ग़ज़ल

यक़ीन है कि वह और आप मेरा उज्र क़बूल करें। और मुझको मुआ़फ़ रखें। ख़ुदा ने मुझ पर रोज़ा नमाज़ मुआ़फ़ कर दिया है। क्या तुम और तफ़्ता एक दीबाचा मुआ़फ़ न करोगे?...

2 जून 1825 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-31

पीर-ओ-मुर्शिद,

मुझ पर इताब क्यों है? न मैं तुम तक आ सकता हूँ, न तुम तशरीफ़ ला सकते हो। सिर्फ़ नामा व पयाम। सो आप ही याद कीजिए कि कितने दिन से आपने अपनी और बच्चों की ख़ैर-ओ-आ़फ़ियत नहीं लिखी। शेख़ वज़ीरुद्‍दीन पहुँचे होंगे। मिर्जा़ हसीन अ़ली बेग़ पहुँचे होंगे। बारे फ़रमाइए। कल से रमज़ान उल मुबारक तशरीफ़ लाए हैं।
कल दिन-भर तो गर्मी रही और शाम से पानी तो बर्फ़ हो गया है। और हवा का यह आलम है कि रात को मैंने रज़ाई ओढ़ी थी। इस हवा का ऐतबार नहीं। अभी मंज़िल दूर है। हाँ साहिब, मियाँ तफ़्ता हम पर खफ़ा हो गए हैं। दो-दो हफ्ते से उनका ख़त नहीं आया। ख़ुदा जाने कहाँ हैं, क्या करते हैं, किस शग़्ल में हैं। आपको अगर उनका हाल मालूम हो तो मुझको भी इत्तिला दीजिए।
हमने अपने घरों में यह रस्म देखी है कि जहाँ लड़का आठ-सात बरस का हुआ और रमज़ान आया तो उसको रोज़ा रखवाते हैं और नमाज़ पढ़वाते हैं। मुझको शब को यह ख़याल आया कि कहीं ऐसा न हो कि बेगम को अब के साल आप रोज़ा रखवाएँ। अभी उसकी उम्र ही क्या है? नवें-दसवें बरस रोज़ा रखवाना-बहरहाल, इस हाल से मुझे अगाई दो और अपना और अपने रोज़े व शग़्ल-ए-हर रोज़ा का हाल लिखो।
मुंशी अ़ब्दुल लतीफ का हाल लिखो कि वह कैसे हैं? रोज़ा ज़रा समझकर रखें। कहीं ऐसा न हो कि गर्मी की ताब न लाएँ और रोज़ा रखकर रंजूर हो जाएँ। मेरी तरफ़ से सबको दुआ़ पहुँचे और हुसैन अ़ली ख़ाँ की तरफ़ से सबक बंदगी और सलाम, और शायद जैसे अ़ब्दुल सलाम और बेगम है, उनको दुआ़ पहुँचे।

19 मई 1855 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-30

हाय-हाय वह नेक बख़्त न बची। वाक़ई यह कि तुम पर और उसकी सास पर क्या गुज़री होगी। लड़की तो जानती ही न होगी कि मुझ पर क्या गुज़री। लड़का शायद याद करेगा और पूछेगा कि अम्मा कहाँ हैं। सो उसका पूछना और तुमको रुलाएगा।
बहरहाल, चारा जुज़ सब्र नहीं है। ग़म करो, मातम रखो, रोओ-पीटो, आख़िर ख़ून-ए-जिगर खाकर चुप रहना पड़ेगा। हक़ तआ़ला अ़ब्दुल लतीफ़ को और तुमक और यतीमों की दादी और फूफियों को सलामत रखे और तुम्हारे दामन-ए-अ़तूफ़त-ओ-आगोश-ए-राफ़त में उनको पाले।...

जुमा, 27 अक्टूबर 1854 ई.

ग़ालिब का ख़त-29

भाई साहिब,

जी चाहता है बातें करने को। हक़ तआ़ला अब्दुल सलाम की माँ को श़िफ़ा दे और उसके बच्चों पर रहम करे। यह जो तप और खाँसी मुज़मिन हो जाती है, तो यह बीमारी नहीं है, रोग है। इस तरह के मरीज़ बरसों जीते हैं और अगर क़िस्मत में होता है तो अच्छे भी हो जाते हैं। कलसूम क माँ का दूध न पिलवाओ। दाई रख लो। मरीज़ा को भी इफ़ाक़त रहेगी और लड़की भी राहत पाएगी।
मुझको देखो। कहाँ ज़ैनउलआबदीन और उसकी बीवी मरे और दो बच्चे छोड़ जाए। और उनमें से एक मैं ले लूँ। मुख़्तसर कहता हूँ। आज तेरहवाँ दिन है कि हुसैन अ़ली ने आँख नहीं खोली। दिन-रात तप और ग़फ़लत और बेखुदी। कल बारहवाँ दिन मसहिल दिया था। चार दस्त आए। मदार दो-चार बार दवा और एक-दो आश जौ पर है, अंजाम अच्छा नज़र नहीं आता। दादी उसकी बीमार। रोज़ दोपहर को लर्जा़ चढ़ता है। आख़िर रोज़ फुर्सत हो जाती है। ज़हर क़ज़ा और अस्र वक़्त पर पढ़ लेती है।
तमाशा यह कि तारीख़ दोनों के तप की एक है। भाई, बीवी की तो इतनी फ़िक्र नहीं। लेकिन हुसैन अ़ली की बीवी ने मार डाला। मैं उसको बहुत चाहता हूँ, ख़ुदा उसको बचा ले और मैं उसको दुनिया में छोड़ जाऊँ। सूखकर काँटा हो गया है। मैंने आगे तुमको नहीं लिखा। यहाँ बड़ी बीमारी फैल रही है। और कोई बीमारी-सी बीमारी, तपै हैं रंगारंग, बेश्तर बारी की, यानी अगर घर में दस आदमी हैं तो छह बीमार होंगे और चार तंदुरुस्त और इन छह में से तीन अच्छे हो जाएँगे तो वे चार बीमार होंगे, आज तक अंजाम बख़ैर था। अब लोग मरने लगे। हवा में सम्मीयत पैदा हो गई। क़िस्से तो यों रहे -
रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमां
हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या

यह डाक का सरिश्ता कैसा बिगड़ा। मैंने अपने नज़दीक अज़ रू-ए-एहतियात बैरंग ख़त भेजना इख़्तियार किया था, गो बमक़्तज़ा--वहम हो। ख़त जब डाकघर में जाता था, रसीद मिलती थी। पोस्टपेड की लाल मुहर, बैरंग की सियाह मुहर, ख़ातिर जमा हो जाती थी। डाक किताब को देखकर याद आ जाता था कि फ़लाना ख़त किस दिन भेजा है और किस तरह भेजा है। अब डाकघर में एक संदूक मुँह खुला हुआ धर दिया है।
जाए ख़त को उसमें फेंके और चला आए, न रसीद, न मुहर, न मशाहिदा, ख़ुदा जाने वह ख़त रवाना होगा, या न होगा। अगर रवाना भी हुआ, तो वहाँ पहुँचने पर डाक के हरकारे को न इनाम का लालच, न सरकार को महसूल की तमाअ़। न दिया हरकारे को या दिया, हरकारे को न पहुँचाया। अगर ख़त न पहुँचा, तो भेजने वाला किस दस्तावेज से दावा करेगा। मगर हाँ, चार आने देकर रजिस्ट्री करवाए। हम दूसरे-तीसरे दिन जाबजा ख़त भेजने वाले रुपया, आठ आने रजिस्ट्री को कहाँ से लाएँ। अहयानन हमने तीन माशे समझकर आध आने का स्टांप लगा दिया। वह खत दो रत्ती बढ़ती निकला।
मकतूब अलै से दूना महसूल लिया गया। ख़ाही न ख़ाही काँटा बाँट रखिए। काँटे का ख़ार-ख़ार अलग। तोलने का क़िस्सा अलग। ख़त भेजना ना हुआ, एक झगड़ा हुआ। एक मुसीबत हुई। आज दसवीं मुहर्रम को यह ख़त लिखा है। कल स्टांप के टुकड़े मँगवाऊँगा। सरनामा पर लगाकर रवाना करूँगा। अंधेरी कोठरी का तीर है। लगा लगा, न लगा न लगा।
ख़ुदा के वास्ते इस ख़त का जवाब जल्द लिखना। अ़ब्दुल सलाम की माँ का मुफ़स्सल हाल लिखना। बद-हवास हूँ, मुझको माफ़ रखना। हाफ़िज जी को दुआ़, मुंशी अ़ब्दुल लतीफ़ को दुआ़।

3
अक्टूबर 1854 ई. असदुल्ला 

ग़ालिब का ख़त-28

भाई साहिब, 

परसों शाम को मिर्जा़ यूसुफ़ अली ख़ाँ शहर में पहुँचे और कल मेरे पास आए। बेगम की पर्दानशीन और घर में बहुत लोगों की बीमारी और फिर तुम्हारी उनके हाल पर इनायतें और शाम की सोहबतों में सुखनवरों की हिकायतें, सब बयान कीं। हैरान हूँ, कि मेह हर तरफ़ खूब बरस रहा है, फिर बीमारी का शयुअ़ क्यों है? यहाँ भी अक्सर लोग तप में मुब्तला हं। हक़ तआ़ला अंजाम बख़ैर करे और अपने बंदों पर रहम फ़रमाए।
अगले ख़त में लिख चुका हूँ कि मरीज़ों की सेहत की ख़बर जल्द लिखिएगा। ज़ाहिरा अब तक कुछ-न-कुछ क़िस्सा चला आता है, कि आपका इनायतनामा अब तक नहीं आया।
हकीम इलाही बख़्श सिकंदराबादी आपके पास पहुँचे हैं। बहुत नेक बख़्त और माकूल आदमी हैं। उनकी परवरिश का ख़याल रहे। और शेख़ रहमत अल्ला साहिब जो आगे आपकी बदौलत कामयाब हो चुके हैं, अगर वहाँ हों तो उनका भी ख़याल रहे। मेरा सलाम कह दीजिए और अगर वहाँ न हों तो उनका हाल मुझको लिखिए।
मिर्जा़ यूसुफ़ अली ख़ाँ कहते थे कि आप उस क़सीदे के तालिब हैं, जो बतरीक़-ए-मरसिया लिखा गया है और उसमें शाह अवध की मदह भी मुंदरिज है। अगर हाथ आ गया तो छापे का, वरना क़लमी भेज दूँगा। बादशाह अवध तक पहुँच गया है। अगर कुछ ज़हूर में आया, तो वह भी तुमको लिखूँगा। बेगम को दुआ़ पहुँचे। क्यों भई, अब हम कोल आए भी, तो तुमको क्योंकर देखेंगे।
क्या तुम्हारे मुल्क में भतीजियाँ चच्चा से पर्दा करती हैं? भाई, ख़ुदा के वास्ते सबकी ख़ैर-ओ-आ़फ़ियत जल्द लिखो। मुंशी हरगोपाल के ख़त से इतना मालूम हुआ कि मियाँ अब्दुल लतीफ़ के घर में अच्छी तरह हैं, औरों का हाल नहीं मालूम हुआ।
 

15 अगस्त 1854 ई.
असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त- 27

भाई साहिब मैं भी तुम्हारा हमदर्द हो गया, यानी मंगल के दिन 18 रबीअ़ उल अव्वल को शाम के वक़्त वह फूफी की मैंने बचपने से आज तक उसको माँ समझा था और वह भी मुझको बेटा समझती थी, मर गई। आपको मालूम रहे कि परसों मेरे गोया नौ आदमी मरे-तीन फूफियाँ और तीन चच्चा और एक बाप और एक दादी और एक दादा, यानी उस मरहूमा के होने से मैं जानता था कि ये नौ आदमी ज़िदा हैं। और उसके मरने से मैंने जाना कि ये नौ आदमी आज यक मार मर गए।...

22 दिसंबर 1853 असदुल्ला

भाई साहिब,
आपके इनायतनामा से भाभी साहिबा के मिज़ाज की नासाज़ी और बच्चों की नाख़ुशी मालूम हुई। परवरदिगार सबको अपनी अमान में रखे। दिन बुरे हैं। यहाँ भी तप का मर्ज़ आ़म है? मगर अंजाब बख़ैर है। ये सब ख़ूबियाँ मेंह न बरसने की हैं। ख़ुदा से दुआ़ माँगता हूँ और आपसे चाहता हूँ कि अब जल्द आप सबकी ख़ैर-ओ-आ़फियत लिखें।
मिर्जा़ यूसुफ़ अ़ली ख़ाँ, अगर अभी वहाँ से न चले हों, तो उनको मेरी दुआ़ कहना, और यह कहना कि मियाँ तुम्हारा ख़त आया। तुम्हारे सब दोस्तों को सलाम कह दिया। वह सब सलाम कहते हैं। अब तुम मुंशी साहिब पर सब अमूर हवाला करकर चले आओ। दिरंग न करो।
ग़ज़ल देखी। भाई साहिब, इन ज़मीनों में मज़ामीन आ़शिक़ाना की गुंजाइश कहाँ? मुआफ़िक इस ज़मीन के अशआ़र मरबूत हैं। मुंशी अब्दुल लतीफ़ और उनके फ़र्जन्द बेगम और उसकी हमजोलियों को दुआ़।

10 अगस्त 1854 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त- 26

ग़ुलाम की क्या ताक़त कि आपसे ख़फ़ा हो। आपको मालूम है कि जहाँ आपका ख़त न आया, मैंने शिकवा लिखना शुरू किया। हाँ, यह पूछना चाहिए कि अब के गिला की निगारिश क्यों मुल्तवी रही। सुनिए, मिर्जा़ यूसुफ़ अ़ली ख़ाँ अलीगढ़ से आए।
उनसे पूछा गया, हमारे भाई साहिब, मिले थे। उन्होंने कहा,'साहिब! न वे वहाँ हैं, न मुंशी अब्दुल लतीफ़, यानी दोनों साहिब दौरा में साहिब मजिस्ट्रेट के साथ हाथरस गए हैं।' अब आप ही कहिए कि मैं ख़त किसको लिखता और कहाँ भेजता। मुंत‍ज़िर था कि आपका ख़त आए तो उसका जवाब लिखूँ। कल हज़रत का नवाज़िशनामा आया। आज जवाब लिखा। आप ही फ़रमाइए कि मैं आपसे ख़फा हूँ या नहीं।
बादशाह का हाल क्या पूछते हो। और अगर तुमने पूछा है तो मैं क्या लिखूँ। दस्त (मोकूफ़) हो गए, मगर कभी-कभी आ जाते हैं। तप जाती रही। मगर गाह-गाह हरारत हो आती है। हिचकी उस शिद्दत की नहीं रही। गाह-गाह छाती जलती रहती है और डकार-सी आती है।



हवादार पलंग के बराबर लगा देते हैं और हज़रत को पलंग पर से हवादार पर बिठा देते हैं। इस हैयत से बरामद भी होते हैं। क़िला-ही-क़िला में फिरकर फिर महल में दाख़िल हो जाते हैं। यूँ तसव्वुर कीजिए और मशहूर भी यूँ ही है कि मर्ज़ आता रहा और ज़ोफ़ बाकी है।
बहरहाल, जब तक सलामत रहें, ग़नीमत है। लेकिन वह मेरा मुद्दा कि गुसल-ए-सेहत करें और नज़रें लें और मैं रुख़सत लूँ और ब-सलीब-ए-डाक बांदा को जाऊँ। देखिए, कब तक हासिल हो। डाक का लुत्फ़ आधा रह गया। यानी वह आम कहाँ और बरसात कहाँ।
मगर ख़ैर, कोल में भाई का मिलना और बच्चों का देखना और बांदा में भाइयों का मिलना और बच्चों का देखना, देखा चाहिए, कब मुयस्सर हो। इस बूढ़ी दाढ़ी पर अपने फ़र्जन्द को दम क्या दूँगा। भाई, ख़ुदा की क़सम।
यह सफ़र मेरे दिल ख़ाह और मुआफ़िक मिज़ाज था, और है मगर ग़ौर करो कि क्या इत्तिफ़ाक हुआ। अगर और सूरत भी हो जाती, तो भी मैं अब तक तुम्हारे पास होकर बांदा को रवाना हो जाता। क्या करूँ। इस सूरत में रुख़सत नहीं माँगी जाती और रुख़सत लिए बग़ैर जाना नहीं हो सकता।

21 अगस्त 1853 असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-25

भाई साहब का इनायतनामा पहुँचा। आपका हाथरस से कोल आ जाना हमको मालूम हो गया था। हमार एक वक़ाए -निगार उस जिले में रहता है। हक़ तआ़ला उसको जीता रखे।
गरमी का यह हाल क्या पूछते हो। इस साठ बरस में यह लू और यह धूप और यह तपिश नहीं देखी। छठी-सातवीं रमज़ान को मेंह खूब बरसा। ऐसा मेंह जेठ के महीने में भी कभी नहीं देखा था। अब मेंह खुल गया है। अब घिरा रहता है। हवा अगर चलती है, तो गरम नहीं होती और अगर रुक जाती है तो क़ियामत आ जाती है।

धूप बहुत तेज है। रोज़ा रखता हूँ, मगर रोज़े को बहलाए रहता हूँ। कभी पानी पी लिया, कभी हुक़्का पी लिया, कभी कोई टुकड़ा रोटी का खा लिया। यहाँ के लोग अजब फ़हम और तुर्फा़ रविश रखते हैं। मैं तो रोज़ा बहलाता रहता हूँ और ये साहिब फ़रमाते हैं कि तू रोज़ा नहीं रखता। यह नहीं समझते कि रोज़ा न रखना और चीज़ है और रोज़ा बहलाना और बात है।
जयपुर का हाल आपको मुंशी साहिब के इज़हार से ये उनके नाम के ख़तूत देखकर मालूम हो गया। मुकर्रर क्यों लिखूँ। ख़ैर, ग़नीमत है। यह क्या फ़र्ज था कि जो हम चाहते थे, वही होता।
हाँ भाई, परसों किसी शख़्स ने मुझसे ज़िक्र किया कि उर्दू अख़बार दिल्ली में था कि हाथरस में बलवा हुआ और मजिस्ट्रेट ज़ख्मी हो गया। आज मैंने एक दोस्त के यहाँ से इस अख़बार का दो वरक़ा मँगाकर देखा। वाक़ई इसमें मुंदरिज था कि राहें चौड़ी करने पर और हवेलियाँ और दुकानें ढाने पर बलवा हुआ। और ‍रिआ़या ने पत्थर मारे और मजिस्ट्रेट जख़्मी हुआ। हैरान हूँ कि अगर यूँ था तो आप क्योंकर तशरीफ़ लाए। हवसनाकाना ख्वा़हिश है कि आप इस हाल को मुफ़स्सिल लिखिए।

22 जून, 1853

ग़ालिब का ख़त-24

आदाब बजा लाता हूँ। बहुत दिन से आपका ख़त नहीं आया। बेगम में मेरा ध्यान लगा हुआ है। आप अक्सर मुझको भूल जाते हैं और जब मेरी तरफ़ से मेरी शिकायत शुरू होती है, तो हज़रत रजूह ब-अदालत-ए-फ़ौजदारी करते हैं और कसरत-ए-अशग़ाल-ए-सरकारी को दस्तावेज़-ए-उज़र बनाते हैं। बहरहाल, इतना तो भूलना मुनासिब नहीं। हर हफ़्ते में एक ख़त आपका और एक ख़त मेरा आता-जाता रहे। इन दिनों में ब-सबब-ए-ईद के क़सीदे की ‍फ़िक्र के मुझक फुर्सत-ए-तहरीर नहीं मिली। क़सीदे जब छापा होकर आएँगे, तो मुआफ़िक़-मामूल आपकी ख़िदमत में इरसाल करूँगा।
मेरे एक दोस्त हैं। उन्होंने एक रुपया मुझक दिया है और यह चाहा कि मैं वह रुपया आपके पास भेजूँ और आप अपने भाई साहिब के पास हाथरस भेज दें, और वह एक रुपए के चाकू, जैसे कि वहाँ बनते हैं, बहुत ताकीद कराकर और फ़रमाइशी तोहफ़ा बनवाकर आपको भेज दें। मैं हैरान था कि रुपया आप तक क्योंकर पहुँचे। बारे मिर्जा़ साहिब आज आ गए और उन्होंने कहा कि मैं कल कोल जाऊँगा।
मैंने यह ख़त लिखकर मय रुपए के उनको दे दिया। मेहरबानी फ़रमाकर हाथरस भेजिए और ताकीद लिखिए कि बहुत अच्छे चाकू जितने आवें, मगर ऐसे कि उनसे बेहतर न हों, बनवाकर भेज दें, जल्द। वस्सलाम। 

मुंशी अब्दुल लतीफ़ को दुआ पहुँचे। बेगम को और नसीरुद्दीन और अ़ब्दुल सलाम को दुआ पहुँचे। जनाब मीर तालिब अ़ली छोलस के रईस, कि जो हैदराबाद के रिसाले में ज़ुल्फकार अ़ली बेग रिसालदार की रिफ़ाकत में मुदर्रिस-ए-रसाला हैं, वे अपने को आपके वालिद माजिद का आश्ना बताते हैं और आपको सलाम कहते हैं।
हक़ तआ़ला, तुमको ख़ुश व ख़ुरम-ओ-तंदुरुस्त, तुम्हारी औलाद के सर परा सलामत रखे और तुम उनका बुढ़ापा देखो और उनके बच्चों को खिलाओ। मुंशी हरगोविंद सिंह आए और उनके बच्चों को खिलाओ। मुंशी हरगोविंद सिंह आए और बेगम का मुझे पयाम दिया कि चच्चा मैंने कान छिदवा लिए हैं। सो तुम मेरी तरफ़ से उसको दुआ कहना और कहना कि तुमको मुबारक हो और तुमक ज़मुर्रुद और याकूत के पत्ते, बालियाँ पहननी नसीब हों।

जुलाई 1851 ई.

ग़ालिब का ख़त-23

भाई साहब को सलाम और मुंशी अब्दुल लतीफ़ और नसीरुद्दीन और प्यारी ज़किया को दुआ़ पहुँचे। हज़रत अ़र्क पिए जाइए और घबराइए नहीं। देखना, क्या फायदा करता है। मुझको तो मुफ़ीद पड़ा। यक़ीन है कि तुमको भी नफ़ा करेगा।
बंदा परवर! पाखल का मुरब्बा और अचार, दोनों मौजूद हैं। खुदा हुज़ूर को सलामत रखे। जब चाहूँ, माँग लाऊँ, मगर भेजूँ क्योंकर? हाँ डाक, उसका यह हाल है कि मर्तबान, कमाल यह है कि टीन में रखकर भेजिए, यह उल्टा-सीधा लाकलाम होगा। अगर मुरब्बा है तो शीरा और अचार है, तो तेल गिर जाएगा। बहरहाल, अचार पाखल का कि वह ब-निस्बत मुरब्बा के ज़्यादातर सूदमंद है, ले आया हूँ और मेरे पास रखा है। जिस तरह हुक्म करो, उस तरह भेज दूँ।
हज़रत काले साहिब और मियाँ निज़ामुद्दीन और भाई गुलाम हुसैन ख़ाँ और तुराबाज़ ख़ाँ और मुग़ल खाँ और सब साहिब सलाम कहते हैं। ज़ैनउलआबदीन ख़ाँ अच्छा है। बीवी भी उसकी फुर्सत पाती चली है। मर्ज़ की सूरत ख़तरनाक नहीं रही। खुदा चाहे तो सेहत हो जाए।
भाई, खुदा के वास्ते हसन अ़ली बेग को समझा दो कि यह क्या तौर है कि एक लौंडे के वास्ते, बीवी को छोड़ दिया है। वालिदा भी तुम्हारी उसकी बात नहीं पूछतीं। वह ग़रीब अपनी ख़ाला के यहाँ पड़ी हुई है। अपनी माँ को लिखो कि बहू को मनाकर ले आवें और तुम्हारे पास रवाना करें। यानी यह सलाह तुम मिर्जा़ को समझाओ और बहुत-सा कहो। फ़क़त।

सन् 1851

ग़ालिब का ख़त-22

भाई साहब को सलाम पहुँचे। भाई अली बख़्श ख़ाँ और भाई तुर्राबाज़ ख़ाँ और मिर्जा़ ज़ैनउलआबदीन ख़ाँ और मजमुअ़-ए-अहबाब सलाम कहते हैं और पोते होने की मुबारकबाद और उसकी तूल-ए-उम्र व दवाम-ए-ऐश की दुआ़ देते हैं।
बीवी मेरी तुम्हारी बीवी को सलाम और बहू को दुआ़ कहती हैं। और तुमको और ज़किया को प्यार करती हैं। और नसीरुद्दीन को दुआ़ कहती हैं। ये सब बातें तुम्हारे पयाम के जवाब में हैं। तुमने जो लिखा था कि अपने घर में मेरे घर की तरफ़ से सलाम और लड़के वालों की तरफ़ से बंदगी कहना, यह उसका जवाब है। यह जवाब और सब अख़ान-ओ-अहवाब का सलाम और तहनियत कई दिन से मेरे पास अमानत था।
आज जुमा के दिन दोपहर के वक़्त गूना फुर्सत थी कि मैंने यह लिख रखा। अगर जीता रहा तो कल सुबह डाक के वक़्त यह ख़त रवाना करूँगा। इंशाअल्लाह उल -अज़ीज़, मेरा दिल बहुत ख़ुश हुआ कि तुमने शेख़ इकरामुद्‍दीन उर्फ़ अब्दुल सलाम करके लिखा। अल्लाह तआ़ला उसको सलामत रखे और उसे मरातब-ए-आ़ली को पहुँचावे कि वह अपने अब्ब-ओ-जद का नाम रोशन करे और फ़ख़-ए-ख़ानदान हो।
मिर्जा़ हसन अ़ली बेग एक रोज़ मेरे पास आए थे। कहते थे कि मुंशी साहिब चाहते हैं कि तू कोल आवे। मैंने कहा-साहिब, ये दिन जाने के नहीं। अगर ख़ुदा चाहेगा, तो अंबा के मौसम में कोल और मारहरे जाऊँगा। मारहरे के पीरज़ादे के बेटे आए थे। मैंने उनसे भी कह दया है कि कोल बरसात में आऊँगा। अगर भाई ने रुख़्सत दी तो मारहरे भी आऊँगा। 

भाई! तुमने वह औराक़ खो दिए, अब मैं क्या करूँ। अगर वह तुम्हारे पास होते, तो मुझको एक लगाव रहता। और मैं मुशक़्क़त खींचकर, जो कुछ कि अब लिखा है, वह लिखकर तुमको भेज देता। जब मैंने देखा कि तुमको ज़ौक़ नहीं, मेरा भी दिल सर्द हो गया। ख़ैर, यह तो हँसी है। अब तुम वह औराक़ वहाँ से न मँगाओ। मैं हज़रत हुमायूँ का हाल तमाम लिख चुका हूँ। अब अज़-सर-ए-नौ किसी कातिब से लिखवाकर तुमको भेजूँगा।
ख़ातिर जमा रखना। अमीर तैमूर, चार पुश्तें बाद उनके, बाबर तक ऐसी गुज़री कि जिसमें किश्वर कुशाई व लश्करकशी नहीं हुई। बाबर, हुमायूँ इन तीन बादशाह-ए-उलुलअ़ज़्म का हाल ब-सबील-ए इजमाल लिख चुका हूँ। अब हज़रत-ए-अकबर शाह का हाल शुरू करूँगा। नौरोज का हंगामा था और क़सीदे की फ़िक्र थी। इस वास्ते भी नस्र की तरफ़ तवज्जोह नहीं हुई। अभी दो-चार दिन दम ले लूँ, तो अब फिर सरगर्म-ए-कार होकर अकबर शशह का हाल लिखना शुरू करूँ। तुम्हारे वास्ते कातिब-ए-ख़ुशनवीस सही नवीस पैदा करके लिखवाता हूँ। घबराना नहीं।
तफ़्ता का हाल आपने भी लिखा था और उनका ख़त भी आया था। मालूम हुआ कि वह कोल से अकबराबाद को गए। नाच, रंग, शराब व कबाब में महव होंगे।
साहिब, कुछ अशआ़र जानी बाँकेलाल के तफ़्ता ने मेरे पास भेजे और एक ख़त उनका, यानी जानी जी का अकबराबाद से ब-तवसुस्त-ए-तफ़्ता मुझको आया। गरज़ यह है कि नज़्म व नस्र इस शख़्स की मरबूत है। मैं उसको इतना नहीं जानता था। अब आप उससे औराक़ का तक़ाजा़ न कीजिए। मैं आपके वास्ते और भेजे देता हूँ।

18 मार्च 1851
असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-21

मुंशी नबी बख्श 'हक़ीर'

बंदा परवर, बहुत दिनों से मेरा ध्यान आप में लगा हुआ था। बारे आपके ख़त आने से बहुत खुशी और फ़र्हत हासिल हुई। यह आपने क्या िखा है कि मैं बदायूं के हकीम की दवा कर रहा हूँ। तेरी बताई हुई दवा अभी नहीं कर सकता। आप ग़ौर तो कीजिए, मैंने तो दवा नहीं बताई। एक तरकीब पानी के मुदब्बिर करने की अ़र्ज है।
साहिबान-ए-अमराज़-ए-सौदाविया 'मुज़म्मिना' को इस पानी का पीना नफ़ा करता है। और नफ़ा इसका बरसों में जाहिर होता है और इस पानी के इस्तेमाल के ज़माने में दवा को मुमानअत नहीं जो दवा चाहिए, खाइए, जो ग़िज़ा चाहिए, तनावुल फ़रमाइए। सिर्फ़ यह पानी कब दवा हो सकता है। आप शौक़ से इस पानी को शुरू कीजिए और दवा तबीब की बदस्तूर किए जाइए और ग़िज़ा मुआफ़िक़ तबीब के खाए जाइए।
पानी जब पीजिए, तब यही पानी पीजिए। जहाँ जाइए आदमी को हुक्म कीजिए, कि एक सुराही इस पानी को ले लेवे। और यह भी आपके ख़्याल में रहे कि अगर नागाह कोई ज़रूरत लाहक़ हो और यह पानी मौजूद न हो और आप पानी ब-हसब-ए-जरूरत पी लेवें, तो भी महल-ए-अंदेशा नहीं है। मुंशी हरगोपाल सतूदा ख़िसाल के बाब में जो कुछ लिखा था, मालूम हुआ। ख़ुदा की क़सम।
 
मुझको उनसे हरगिज़ मलाल नहीं हुआ, बल्कि मुझको यह ग़म था कि कहीं वह अपनी ग़लतफ़हमी से मुझसे मलूल न हुए हों। बहरहाल, इस गुफ़्तगू में मुंशी साहिब ने एक फ़िक़रा अपनी मदह में बढ़वा लिया। आप उनसे मेरा सलाम कहिएगा और यह कहिएगा कि मैं तुमसे राज़ी और खुश हूँ। यह चाहता हूँ कि तुम मुझसे राज़ी रहो और मुझको अपना ‍ख़िदमत गुज़ार समझो। रुबाइयाँ आपकी भेजी हुई मेरे पास मौजूद हैं। बाद इस्लाह के आपके पास भेज दूँगा। घबराइए नहीं, ख़ातिर जमा रखिए।
असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-20

खिचड़ी खाई दिन बहलाए, कपड़े फाटे घर को आए

आठ जनवरी माह-ओ-साल-ए-हाल दो शंबे के दिन ग़ज़ब़-ए-इलाही की तरह अपने घर पर नाज़िल हुआ। तुम्हारा ख़त मय मज़ामीन-ए-दर्दनाक से भरा हुआ रामपुर में मैंने पाया। जवाब लिखने की फुरसत न मिली कि मुरादाबाद में पहुँचकर बीमार हो गया। पाँच दिन सदर-उल-सदूर साहिब के यहाँ पड़ा रहा। उन्होंने बीमारदारी और ग़मख़ारी बहुत की।
क्यों तर्क-ए-लिबास करते हो? पहनने को तुम्हारे पास है क्या जिसको उतार फेंकोगे? तर्क-ए-लिबास से क़ैद-ए-हस्ती मिट न जाएगी। बग़ैर खाए-पिए गुज़ारा न होगा। सख्ती व सुस्ती रंज-ओ-आराम को हमवार कर दो जिस तरह हो उसी सूरत से, ब-हर-सूरत गुज़रने दो-
ताब लाए हो बनेगी ग़ालिब
वा‍क़िआ़ सख्त है और जान अज़ीज़।
इस खत की रसीद का ता़लिब,
ग़ालिब
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मुंशी हरगोपाल, अर्जी मिर्जा़ तफ़्ता,
तुमने रुपया भी खोया और अपनी फ़िक्र को और मेरी इस्लाह को भी डुबोया, हाय क्या बड़ी कापी है। अपने अशआ़र की और इस कापी की मिसाल जब तुम पर खुलती कि तुम यहाँ होते और बेगमात-ए-क़िला को चलते-फिरते देखते। सूरत माह-ए-हफ्ता की सी और कपड़े मैले। पांयचे लीर-लीर। जूती टूटी। यह मुबालग़ा नहीं, बल्कि बेतकल्लुफ़ 'संबुलिस्तान' एक माशूक़ ख़ूबरू है। बदलिबास है। बहरहाल, दोनों लड़कों को दोनों जिल्दें दे दीं और मुअ़लम को हुक्म दे दिया कि इसका सबक़ दे। चुनांचे आज से शुरू हो गया।

9
माहै अप्रैल 1861 ई.
ग़ालिब

ग़ालिब का ख़त-19

मिर्जा़ तफ्ता,
जो कुछ तुमने लिखा, यह बेदर्दी है और बदगुमानी। मआ़ज़ अल्लाह तुमसे और आजुर्दगी! मुझको इस पर नाज़ है कि मैं हिंदुस्तान में एक दोस्त-ए-सादिक़-अल-विला रखता हूँ, जिसका 'हरगोपाल' नाम और 'तफ्ता 'तख़ल्लुस है। तुम ऐसी कौन सी बात लिखोगे कि मूजब-ए-मलाल हो? रहा ग़म्माज़ का कहना, उसका हाल यह है कि मेरा हक़ीक़ी भाई कुल एक था, कि वह तीस बरस दीवाना रहकर मर गया। मसलन वह जीता होता और होशियार होता और तुम्हारी बुराई कहता, तो मैं उसको झिड़क देता और उससे आजुर्द होता। 

भाई, मुझमें कुछ अब बाकी नहीं है। बरसात की मुसीबत गुज़र गई। लेकिन बुढ़ापे की शिद्दत बढ़ गई। तमाम दिन पड़ा रहता हूँ, बैठ नहीं सकता। अक्सर लेटे-लेटे लिखता हूँ, महिज़ यह भी ‍है कि अब मशक़ तुम्हारी पुख्ता हो गई़ ख़ातिर मेरी जमा है कि इस्लाह की हाजत न पाऊँगा। इससे बढ़कर यह बात है ‍कि क़सायद सब आश्क़ाना हैं, ब-कार-ए-आमदनी नहीं। ख़ैर, कभी देख लूँगा, जल्दी क्या है?
तीन बात जमा हुईं, मेरी काहिली तुम्हारे कलाम का मोहताज ब इस्लाह न होना, किसी क़सीदे से किसी तरह के नफ़े का तसव्वुर न होना। नज़रान मरातिब पर, काग़ज़ पड़े रहे। लाला बालमुकंद बेसबर का एक पार्सल है कि उसको बहुत दिन हुए, आज तक सरनामा भी नहीं खोला। नवाब साहिब की दस-पंद्रह ग़ज़लें पड़ी हुई हैं।

जो़फ़ ने गा़लिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

यह क़सीदा तुम्हारा कल आया। आज इस वक्त, कि सूरज बुलंद नहीं हुआ, इसको देखा। लिफ़ाफ़ा किया, आदमी के हाथ डाकघर भिजवाया।

27 नवंबर 1862 गा़लिब 

ग़ालिब का ख़त-18

मेरी जान,
आख़िर लड़के हो, बात को न समझे। मैं तो और तफ्ता का अपने पास होना ग़नीमत न जानूँ। मैंने यह लिखा था कि बशर्त-ए-इक़ामत बुला लूँगा और फिर लिखता हूँ कि अगर मेरी इक़ामत यहाँ की ठहरी तो बे तुम्हारे न रहूँगा, न रहूँगा, ज़िनहार न रहूँगा।
मुंशी बालमुकुंद बेसबर का ख़त बुलंदशहर से  दिल्ली और दिल्ली से रामपुर पहुँचा। तलफ़ नहीं हुआ। अगर मैं यहाँ रह गया, तो यहाँ से, और अगर दिल्ली चला गया, तो वहाँ से इस्लाह देकर उनके अशाअ़र भेज दूँगा।
 
बेसबर को अब के बारह महीना-भर सबर चाहिए। वह लिफ़ाफ़ा बदस्तूर रखा हुआ है। अज़बसक़ि यहाँ के हज़रत मेहरबानी फ़रमाते हैं और हर वक्त आते हैं, फ़ुर्सत-ए-मुशाहिदा-ए-औराक़ नहीं मिली। तुम इसी रुक्के़ को उनके पास भेज ‍देना।

14
फरवरी 1860 ई. ग़ालिब
भाई, आज इस वक्त तुम्हारा ख़त पहुँचा। पढ़ते ही जवाब लिखता हूँ। ज़र-ए-सह साला-ए-मुजतम्मा हज़ारों कहाँ से हुए। सात सौ पचास रुपया साल पाता हूँ। तीन बरस के दो हज़ार दो सौ पचास रुपए। सौ रुपए मुझे मदद-खर्च मिले थे वे कट गए, डेढ़ सौ मुतफ़र्रिक़ात में गए, रहे दो हज़ार रुपए। मीर मुख्तार कार एक बनिया है और मैं उसका कर्जदार क़दीम हूँ।
अब जो वह दो हज़ार लाया, उसने अपने पास रख लिए और मुझसे कहा कि मेरा हिसाब कीजिए। सात कम पंद्रह सौ उसके सूद-मूल के हुए। क़र्ज़ मुतफ़र्रिक़ात ग्यारह सौ चुका दे, नौ सौ बाक़ी रहे, आधे तू ले, आधे मुझको दे, परसों चौथी को वह रुपया लाया है।
कल तक क़िस्सा नहीं चुका। मैं जल्दी नहीं करता, दो-एक महाजन बीच में हैं, हफ्ते-भर में झगड़ा फ़ैसल हो जाएगा, ख़ुदा करे, यह ख़त तुमको पहुँच जाए। जिस दिन बारात से फिरकर आओ, उसी दिन मुझको अपने वुरूद-ए-मसऊद की खबर देना।

मई 1860 ग़ालिब 

ग़ालिब का ख़त-17

क्यों साहिब,
रूठे ही रहोगे या की मनोगे भी? और अगर किसी तरह नहीं मनते हो तो रूठने की वजह तो लिखो। मैं इस तनहाई में सिर्फ़ ख़तों के भरोसे जीता हूँ, यानी जिसका ख़त आया मैंने जाना कि वह शख्स तशरीफ़ लाया। 

ख़ुदा का अहसान है कि कोई दिन ऐसा नहीं होता, जो इतराफ़ व जवानिब से दो-चार ख़त नहीं आ रहते हों। बल्कि ऐसा भी दिन होता है कि दो-दो बार डाक का हरकारा ख़त लाता है, एक-दो सुबह को और एक-दो शाम को मेरी दिल्लगी हो जाती है, दिन उनके पढ़ने और जवाब लिखने में गुज़र जाता है। यह क्या सबब? दस-दस, बारह-बारह, दिन से तुम्हारा ख़त नहीं आया।
यानी तुम नहीं आए। ख़त लिखो, साहिब, न लिखने की वजह लिखो। आध आने में बुख्ल न करो। ऐसा ही है तो बैरंग भेजो।

सोमवार, 27 दिसंबर 1858 ई. गा़लिब 

देखो साहिब, ये बातें हमको पसंद नहीं। सन् 1858 के ख़त का जवाब 1859 में भेजते हो और मज़ा यह है कि जब तुमसे कहा जाएगा तो यह कहोगे कि मैंने दूसरे ही दिन जवाब लिखा है।
लुत्फ़ इसमें है कि मैं भी सच्चा और तुम भी सच्चे। आज तक राय उमेदसिंह यहीं हैं और अभी नहीं जाएँगे। तुम्हारा मुद्दआ़ हासिल हो गया है। जिस दिन वह आए थे, उसी दिन मुझसे कह गए थे। मैं भूल गया और उस ख़त में तुमको न लिखा। साहिब, वे फ़रमाते थे कि मैंने कई मुजल्लद मिर्जा तफ्ता के दीवान के और कई नुस्ख़े 'तज़मीन-ए-अशआ़र-ए-गुलिस्तां' के उनकी ख़ाहिश के बमूजब, कोई पारसी है बंबई में, उसके पासभेज दिए हैं।
यक़ीन है कि वह ईरान को इरसाल करेगा। उमेदसिंह ने उसी पारसी का नाम भी लिया था, मैं भूल गया। अब जो तुमको इस ख्याल में मुब्तिला पाया, तो उनका मुझको याद आया। जानता हूँ कि वे कहाँ रहते हैं। दस बार उनके घर गया भी हूँ। मगर मुहल्ले का नाम नहीं जानता, न मेरे आदमियों में कोई जानता है। अब किसी जानने वाले से पूछकर तुमको लिख भेजूँगा।
मीर बादशाह साहिब से इंदुलमुलाक़ात मेरी दुआ़ कह देना।....

3 जनवरी 1859 ई. 

ग़ालिब का ख़त-16

क्यों साहिब, इसका क्या सबब है कि बहुत दिन से हमारी-आपकी मुलाक़ात नहीं हुई। न मिर्जा साहिब ही आए, न मुंशी साहिब ही तशरीफ़ लाए।

हाँ, एक बार मुंशी शिवनारायण साहिब ने करम किया था और ख़त में यह रक़म किया था कि अब एक फ़र्मा बाकी रहा है। इस राह से मैं यह तसव्वुर कर रहा हूँ कि अगर एक फ़र्मा नस्र का बाक़ी था, तो अब क़सीदा छापा जाता होगा और फ़र्मा क़सीदे का था, तो अब जिल्दें बननी शुरू हो गई होंगी।
तुम समझे? मैं तुम्हारी, और भाई मुंशी नबी बख्‍श साहिब और जनाब मिर्जा हातिम अली साहिब के ख़तूत के आने को तुम्हारा और उनका आना समझता हूँ। तहरीर गोया वह मुकालमा है जो बाहम हुआ करता है। फिर तुम कहो मुकालमा क्यों मौकूफ है और अब क्या देर है और वहाँ क्या हो रहा है? भाई साहिब को कापी की तसीह से फ़रागत हो गई।
मिर्जा साहिब ने जिल्दें सह्‍हाफ़ को दे दीं? मैं अब उन किताबों का आना कम तक तसव्वुर करूँ? दशहरे में एक-दो दिन की तातील मुक़र्रर हुई। कहीं दीवाली की तातील तक नौबत न पहुँच जाए।
हाँ साहिब, तुमने कभी कुछ हाल क़मरुद्‍दीन ख़ाँ साहिब का न लिखा। आगे इसेस तुमने अगस्त, सितंबर में उनका आगरे का आना लिखा, फिर वह अक्टूबर तक क्यों न आए? वहाँ तो मुंशी गुलाम ग़ौस खाँ साहिब अपना काम बदस्तूर करते हैं, फिर ये उस दफ्तर में क्या कर रहे हैं? कहीं किसी और काम पर मुऐयन हो गए हैं? इसका हाल जल्द लिखो। मुझको याद पड़ता है ‍कि तुमने लिखा था कि मुंशी गुलाम ग़ौस खाँ साहिब को एक गाँव जागीर में मिला है। मौलवी क़मरुद्दीन खाँ साहिब उसके बंदोबस्त को आया चाहते हैं। उसका ज़हूर क्यों न हुआ? इन सब बातों का जवाब जल्द लिखिए।
जनाब मिर्जा साहिब को मेरा सलाम कहिए और पयाम कहिए कि किताब का हुस्न कानों से सुना, दिल को देखने से ज्यादा यक़ीन आया। मगर आँखों को रश्क है कानों पर और कान चश्मकज़नी कर रहे हैं आँखों पर। यह इरशाद हो कि आँखों का हक आँखों को कब तक मिलेगा।
भाई साहिब को बाद अज़ सलाम कहिएगा कि हज़रत अपने मतलब की तो मुझे जल्दी नहीं है। आपकी तख़फ़ीफ़-ए-तसदीह चाहता हूँ, यानी अगर कापी का किस्सा तमाम हो जाए तो आपको आराम हो जाए।
जनाब मुंशी शिवनारायण साहिब की इनायतों का शुक्र मेरी ज़बानी अदा कीजिएगा और यह कहिएगा कि आपका ख़त पहुँचा, चूँकि मेरे ख़त का जवाब था और मुआहिज़ा कोई अमर जवाब तलब न था, इस वास्ते उसका जवाब नहीं लिखा। ज्यादा, ज्यादा।

17 अक्टूबर 1858 ई. राक़िम गा़लिब

ग़ालिब का ख़त-15

भाई,
मुझमें-तुममें नामानिगारी काहे को है, मकालमा है। आज सुबह को एक ख़त भेज चुका हूँ, अब इस वक्त तुम्हारा ख़त और आया। सुनो, साहिब, लफ्ज मुबालक 'मीम, हा, मीम, दाल' इसके हर हरफ़ पर मेरी जान निसार है। मगर चूँकि यहाँ से विलायत तक हुक्काम के हाँ से यह लफ्ज, यानी 'मुहम्मद असदुल्ला खाँ' नहीं लिखा जाता, मैंने भी मौकूफ कर दिया है।

रहा 'मिर्जा' व 'मौलाना' व 'नवाब', इसमें तुमको और भाई को इख्तियार है, जो चाहो सो लिखो। भाई को कहना, उनके खत का जवाब सुबह को रवाना कर चुका हूँ। मिर्जा तफ्ता, अब तुम तज़ईन-ए-जिल्दहा-ए-किताब के बाब में बरादरज़ादा सआ़दतमंद क तकलीफ़ न दो। मौलाना मेहर को इख्तियार है, जो चाहें सो करें।
ख़त तमाम करके ख्याल में आया कि वह जो मिर्जा साहिब से मुझको मतलूब है, तुम पर भी जाहिर करूँ। साहिब, वहाँ एक अख़बार मोसूम ब 'आफ़ताब-ए-आलमताब' ‍निकलता है। उसके महतमिम ने इल्तजा़म किया है कि एक सफ्हा या डेढ़ सफ्‍हा बादशाह-ए-दिल्ली के हालात का लिखता है, नहीं मालूम, आगा़ज़ किस महीने से है।
सो हकीम अहसन उल्ला खाँ यह चाहते हैं कि साबिक़ के जो औराक हैं, जब से वह, वे जो छापेख़ाने में मसौदे रखते हैं, उसकी नक्ल किसी कातिब से लिखवाकर यहाँ भेजी जाए। उजरत जो लिखी आएगी, वह भेजी जाएगी, और इबतदाए (सितंबर) 1885 से उनका नाम ख़रीदारों में लिखा जाए।
दो हफ्ते के दो लंबर उनको एक लिफ़ाफ़े में भेज दिए जाएँ और फिर हर महीने, हफ्ता दर हफ्ता उनको लिफ़ाफ़ा अख़बार का पहुँचा करे। यह मरातब जनाब मिर्जा हातिम अली साहिब को लिख चुका हूँ और अब तक आसार-ए-क़बूल ज़ाहिर नहीं हुए। न लिफ़ाफ़े हक़ीम साहब के पास पहुँचे, न उन सफहात की नक्ल मेरे पास आई।
आपको इसमें सई ज़रूर है और हाँ साहिब, 'आफ़ताब-ए-आलमताब' का मतबा तो 'कश्मीरी बाज़ार' में है, मगर आप मुझको लिखें कि 'मुफ़ीद-ए-ख़लायक़' का मतबा कहाँ है। अजब है कि इन साहिब-ए-शफ़ीक़ ने मेरी तहरीरात का जवाब नहीं लिखा। फ़रमाइश हकीम अहसन उल्ला खाँ साहिब की बहुत अहम है। इंदुलमुलाक़ात मेरा सलाम कहकर उसका जवाब, बल्कि वह अख़बार उनसे भिजवाओ।

17 सितंबर 1858 ई.
 

Sunday, March 18, 2012

ग़ालिब का ख़त-14

रखियो ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई में मुआ़फ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है


बंदा परवर,
पहले तुमको यह लिखा जाता है किमेरे दोस्त क़दीम मीर मुकर्रम हुसैन साहिब की ख़िदमत में मेरा सलाम कहना और यह कहना कि अब तक जीता हूँ और इससे ज्यादा मेरा हाल मुझको भी मालूम नहीं। मिर्जा हातिम अली साहिब मेहर की जानिब में मेरा सलाम कहनो...




तुम्हारे पहले ख़त का जवाब भेज चुका था, कि उसके दो दिन या तीन दिन के बाद दूसरा ख़त पहुँचा। सुनो साहिब, जिस शख्स को जिस शग्ल का ज़ौक़ हो और वह इसमें बेतकल्लुफ़ उम्र बसर करे, इसका नाम ऐश है। और भाई, यह जो तुम्हारी सुखन-गुस्तरी है, इसकी शोहरत में मेरीभी तो नामवरी है। मेरा हाल इस फ़न में अब यह है कि शेर कहने की रविश और अगले कहे हुए अशआ़र सब भूल गया। 

सब हाँ, अपने हिंदी कलाम में से डेढ़ शेर, यानी एक मुक्ता और एक मिसरा याद रह गया है। सो गाह-गाह जब, दिल उलटने लगता है, तब दस-पाँच बार यह मक्ता़ ज़बान पर आ जाता है।

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे 


फिर जब सख्त घबराता हूँ और तंग आता हूँ तो यह मिसरा पढ़कर चुप हो जाता हूँ-

ऐ मर्ग-ए-नागहां! तुझे क्या इंतजार है?
यह कोई न समझे कि मैं अपनी बेरौनक़ी और तबाही के ग़म में मरता हूँ। जो दुख मुझको है उसका बयान तो मालूम, मगर उस बयान की तरफ़ इशारा करता हूँ। अँग्रेज़ की क़ौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से क़त्ल हुए, उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शफ़ीक़ और कोई मेरा दोस्त और कोई मेरा यार और कोई मेरा शागिर्द, कुछ माशूक़, सो वे सबके सब खाक़ में मिल गए।
एक अज़ीज़ का मातम कितना सख्त होता है! जो इतने अज़ीज़ों का मातमदार हो, उसको ज़ीस्त क्योंकर न दुश्वार हो। हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।  

ग़ालिब का ख़त-13

क्यों साहिब,
मुझसे क्यों ख़फा़ हो? आज महीना-भर हो गया होगा, या बाद दो-चार दिन के हो जाएगा, कि आपका ख़त नहीं आया। इंसाफ़ करो कितना कसीर-उल-एहबाब आदमी था। कोई वक्त ऐसा न था कि मेरे पास दो-चार दोस्त न होते हों। अब यारों में एक शिवाजीराम ब्राह्मण और बालमुकुंद उसका बेटा, ये दो शख्स हैं कि गाह-गाह आते हैं।

इससे गुज़रकर, लखनऊ और काल्पी और फर्रुख़ाबाद और किस-किस जिले से ख़तूत आते रहते थे। उन दोस्तों का हाल ही नहीं मालूम कि कहाँ हैं, और किस तरह हैं? वह आमाद ख़तूत की मौकूफ़, सिर्फ तुम तीन साहिबों के ख़त के आने की तवक्क़ो, उसमें वे दोनों साहिब गाह। हाँ, एक तुम कि हर महीने में एक-दो बार मेहरबानी करते हो।
सुनो साहिब, अपने पर लाज़िम कर लो, हर महीने में एक ख़त मुझको लिखना। अगर कुछ काम आ पड़ा, दो ख़त तीन ख़त, वरना सिर्फ ख़ैर-ओ-आफ़ियत लिखी और हर महीने में एक बार भेज दी।
भाई साहिब का भी ख़त दस बाहर दिन हुए कि आया था, उसका जवाब भेज दिया गया। मौलवी क़मरुद्दीन ख़ाँ यक़ीन है ‍कि इलाहाबाद गए हों, किस वास्ते कि मुझको मई में लिखा था कि अवायल जून में जाऊँगा। बहरहाल, अगर आप आजुर्दा नहीं तो जिस नि मेरा ख़त पहुँचे, उसके दूसरे दिन इसका जवाब लिखिए। अपनी खै़र-ओ-आ़फियत, मुंशी साहिब की खै़र-ओ-आ़फियत, मौलवी साहिब का अहवाल।
इससे सिवा ग्वालिअर के फ़ितना व फ़साद का माजरा, जो मालूम हुआ हो वह अल्फ़ाज-ए-मुनासिब-ए-वक्त में ज़रूर लिखना, राजा जो वहाँ आया हुआ है, उसकी हक़ीक़त, धौलपुर का रंग, साहिबान-ए-आलीशान का इरादा वहाँ के बंदोबस्त का किस तरह पर है? आगरा का हाल क्या है? वहाँ के रहने वाले कुछ ख़ाइफ़ हैं या नहीं?

19 जून 1858 ई. गा़लिब

ग़ालिब का ख़त-12

साहिब, तुमने लिखा था कि मैं जल्द आगरा जाऊँगा। तुम्हारे उस ख़त का जवाब न लिख सका। जवाब तो लिख सकता था, मगर कल्यान का पाँव सूज गया था, वह चल नहीं सकता। मुसलमान आदमी शहर में सड़क पर बिन टिकट फिर नहीं सकता। नाचारा तुमको ख़त न भेज सका। बाद चंद रोज़ के जो कहार अच्छा हुआ तो मैं तुमको आगरा में समझकर सिकंदराबाद ख़त न भेज सका। मौलवी क़मरुद्दीन ख़ां के ख़त में तुमको सलाम लिखा।




कल उनका ख़त आया, वह लिखते हैं कि मिर्जा तफ्ता अभी यहाँ नहीं आए। इस वास्ते आज यह रुक्क़ा तुमको भेजता हूँ। मेरा हाल बदस्तूर है। देखिए, खुदा को क्या मंजूर है। हाकिम अकबर ने आकर कोई नया बंदोबस्त जारी नहीं किया। यह साहिब मेरे आशना-ए-क़दीम हैं, मगर मैं मिल नहीं सकता। ख़त भेज दिया है। हनूज़ कुछ जवाब नहीं आया। तुम लिखो कि अकबराबाद कब जाओगे। 
5 मार्च 1858 ई. ग़ालि

साहिब,
25
अप्रैल को एक ख़त और एक पार्सल डाक में इरसाल कर चुका हूँ। आज 30 है। यकी़न है कि ख़त और पार्सल, दोनों पहुँच गए होंगे। एक अमर ज़रूरी बाइस इस तहरीर का है कि जो मैं इस वक्त रवाना करता हूँ। एक मेरा दोस्त और तुम्हारा हमदर्द है। उसने हमने हकी़क़ी भतीजे को बेटा कर लिया था।
अठारह-उन्नीस बरस की उम्र, क़ौम का खतरी, खूबसूरत नौजवान, वज़हदार सन् 1273 हिजरी में बीमार पड़कर मर गया। अब उसका बापू मुझसे अरज करता है कि एक 'तारीख़' उसके मरने की लिखूँ, ऐसी कि वह फ़क़त तारीख़ न हो, बल्कि मरसिया हो कि वह उसको पढ़-पढ़कर रोया करे। सो भाई, उस सायल की ख़ातिर मुझको अज़ीज़ और फिक्र-ए-शेर मतरू़क यह वाक़िआ तुम्हारे हस्ब हाल है। जो ख़ूंचकां शेर तुम निकालोगे, वे मुझसे कहाँ निकलेंगे? ब-तरीक़-ए-मसनवी बीस-तीस शेर लिख दो।
मिसरा-ए-आख़िर में माद्‍दा-ए-तारीख़ डाल दो। नाम उसका 'ब्रजमोहन' था और उसको 'बाबू', 'बाबू' कहते थे। चुनांचे मैं बहर-ए-हज़ज-ए-मसद्दस मजनूं में एक शेर तुमको लिखता हूँ। चाहो इसको आगा़ज़ में रहने दो और आइंदा इसी बहर में और अश़आर लिख लोल चाहो कोई और तरह निकालो। लेकिन यह ख़याल रहे कि सायल को मतवफ्फ़ी के नाम दर्ज होना मंजूर है और 'बाबू ब्रजमोहन' सिवाय इस बहर के या बहर-ए-रमल के और बहर में नहीं आ सकता।

30 अप्रैल 1858 ई. गा़लिब

ग़ालिब का ख़त-11

आज सनीसचर वार को दोपहर के वक्त डाक का हरकारा आया और तुम्हारा ख़त लाया और मैंने पढ़ा और जवाब लिखा और कल्यान को दिया। वह डाक को ले गया। खुदा चाहे तो कल पहुँच जाए। मैं तुमको पहले ही लिख चुका हूँ कि  दिल्ली का कस्द क्यों करो और यहाँ आकर क्या करोगे? बैंक-घर में से खुदा करे, तुम्हारा रुपया मिल जाए।

भाई, मेरा हाल यह है कि दफ्तर शाही में मेरा नाम मुंदरिज नहीं निकला। किसी मुख़बिर ने ब-निस्बत मेरी कोई खबर बदख़ाही को नहीं दी। हुक्काम-ए-वक्त मेरा होना शहर में जानते हैं। फ़रारी नहीं हूँ, रूपोश नहीं हूँ, बुलाया नहीं गया। दारा-ओ-गीर से महफूज़ हूँ। किसी तरह की बाज़ परस हो, तो बुलाया जाऊँ।
मगर हाँ, जैसा कि बुलाया नहीं गया, खुद भी बरू-ए-कार नहीं आया, किसी हाकिम से नहीं मिला, ख़त किसी को नहीं लिखा, किसी से दरख्वास्त-ए-मुलाक़ात नहीं की। मई से पेंशन नहीं पाई। कहो, ये नौ-दस महीने क्यों कर गुज़रे होंगे? अंजाम कुछ नज़र नहीं आता। नहीं कि क्या होगा। ज़ंदा हूँ, मगर ज़िंदगी बबाल है। हरगोबिंद सिंह यहाँ आए हुए हैं। एक बार मेरे पास भी आए थे।
ग़ालि
30
जनवरी 1858 ई. 

ग़ालिब का ख़त-10

साहिब,
तुम जानते हो कि यह मुआ़मला क्या है और क्या वाकै़ हुआ? वह एक जनम था कि जिसमें हम-तुम बाहम दोस्त थे और तरह-तरह के हममें-तुममें मुआ़मलात-ए-महर-ओ-मुहब्बत दरपेश आए। शेर कहे, दीवान जमा किए। 

उसी ज़माने में एक और बुजुर्ग थे कि वह हमारे-तुम्हारे दोस्त-ए-दिली थे और मुंशी नबी बख्श उका नाम और हक़ीर तख़ल्लुस था। नागाह, न वह ज़माना रहा, न वे अशख़ास, न वे मुआ़मलात, न वह इख़तिलात़ न वह इंबिसात। बाद चंद मुद्‍दत के फिर दूसरा जनम हमको मिला, अगर्चे सूरत इस जनम की बिऐनिही ही मिस्ल पहले जनम के हैं।
यानी एक ख़त मैंने मुंशी नबी बख्श साहिब को भेजा, उसका जवाब मुझको आया और एक ख़त तुम्हारा कि तुम भी मौसूम ब-मुंशी हरगोपाल व मुतख़ल्लस ब-तफ्‍ता हो, आज आया। और मैं जस शहर में हूँ, उसका नाम भी दिल्ली और उस मुहल्ले का नाम 'बल्ली मारों का मुहल्ला' है, लेकिन एक दोस्त उस जनम के दोस्तों मेंसे नहीं पाया जाता। वल्लाह! ढूँढने को मुसलमान इस शहर में नहीं मिलता। क्या अमीर, क्या गरीब, क्या अहले-ए-हिरफ़ा। 


अगर कुछ हैं, तो बाहर के हैं। हिंदू अलबत्ता कुछ-कुछ आबाद हो गए हैं। अब पूछो कि तू क्योंकर मसकन-ए-क़दीम बैठा रहा। साहिब-ए-बंदा, मैं हकीम मुहम्मद हसन खाँ मरहूम के मकान में नौ-दस बरस से किराए को रहता हूँ और यहाँ क़रीब क्या, बल्कि दीवार-ब-दीवार हैं घर हकीमों के और वे नौकर हैं राजा नरेंद्रसिंह बहादुर वालिये पटियाला के। राजा ने साहिबान-ए-आलीशान से अहद ले लिया था किबर वक्त गा़रत-ए-दिल्ली ये लोग बचे रहें। चुनांचे बाद-ए-फ़तह राजा के सिपाही यहाँ आ बैठे और यह कूचा महफूज रहा, वरना मैं कहाँ और यह शहर कहाँ?
मुबालग़ा न जानना, अमीर-ग़रीब सब निकल गए, जो रह गए थे, वे निकाले गए, जागीरदार, पेंशनदार, दौलतमंद, अहल-ए-हिरफ़ा, कोई भी नहीं है। मुफ़स्सल हाल लिखते हुए डरता हूँ। मुलाज़मान-ए-किला पर शिद्दत है और बाज़ पुरस और दार-ओ-गीर में मुबतला हैं, मगर वे नौकर जो इस हंगामे में नौकर हुए हैं और हंगामे में शरीक रहे हैं, मैं गरीब शायर दस-दस बरस से तारीख़ लिखने और शेर की इस्लाह देने पर मुतअ़ल्लिक हुआ हूँ। ख़ाह उसको नौकरी समझो, ख़ाह मजदूरी जानो। इस फ़ितना व आशोब में किसी मसहलत में मैंने दखल नहीं किया।
सिर्फ अशआ़र की ख़िदमत बजा लाता रहा, और नज़र अपनी बेगुनाही पर शहर से निकल नहीं गया। मेरा शहर में होना हुक्काम को मालूम है, मगर चूँकि मेरी तरफ़ बादशाही दफ्तर में से या मुख़बिरों के बयान से कोई बात पाई नहीं गई, लिहाज़ा तलबी नहीं हुई। वरना जहाँ बड़े-बड़े जागीरदार बुलाए हुए या पकड़े हुए आए हैं, मेरी क्या हक़ीकत थी। ग़रज़ कि अपने मकान में बैठा हूँ, दरवाजे से बाहर निकल नहीं सकता।
सवार होना या कहीं जाना तो बहुत बड़ी बात है। रहा यह कि कोई मेरे पास आवे, शहर में है कौन जो आवे? घर के घर बे-चराग़ पड़े हैं, मुजरिम सियासत पाए जाते हैं, जर्नेली बंदोबस्त 11 मई से आज तक, यानी 5 सितंबर सन् 1857 तक बदस्तूर है। कुछ नेक व बद का हाल मुझको नहीं मालूम, बल्कि हनूजल ऐसे अमूर की तरफ़ हुक्काम की तवज्जोह भी नहीं।
देखिए अंजाम-ए-कार क्या होता है। यहाँ बाहर से अंदर कोई बगैर टिकट का आने-जाने नहीं पाता। तुम ज़िनहार यहाँ का इरादा न करना। अभी देखना चाहिए, मुसलमानों की आबादी का हुक्म होता है या नहीं। बहरहाल, मुंशी साहिब को मेरा सलाम कहना और यह ख़त दिखा देना। इस वक्त तुम्हारा ख़त पहुँचा और इसी वक्त मैंने यह ख़त लिखकर डाक के हरकारे को दिया।

5 दिसंबर 1857

ग़ालिब का ख़त- 9

तुम्हारा ख़त पहुँचा, मुझको बहुत रंज हुआ। वाक़ई, उन छोटे लड़कों का पालना बहुत दुश्वार होगा। देखो़, मैं भी तो इसी आफ़त में गिरफ्तार हूँ। सब्र करो, सब्र न करोगे तो क्या करोगे, कुछ बन नहीं आती। मैं मुसहिल में हूँ। यह न समझना कि बीमार हूँ' हिफ्ज़-ए-सेहत के वास्ते मुसहिल लिया है। 

तुम्हारे अशआ़र गौ़र से देखकर भाई मुंशी नब्बी बख्‍श साहिब के पास लिफ़ाफ़ा तुम्हारे नाम का भेज दिया है। जब तुम आओगे, तब वह तुमको देंगे। जहाँ-जहाँ तरद्‍दुद व ताम्मुल की जगह थी, वह जाहिर कर दी है और बाक़ी सब अशआ़र बदस्तूर रहने दिए हैं।
अब तुमको यह चाहिए कि कोल पहुँचकर मुझको ख़त लिखो। इस लिफ़ाफ़े की रसीद और अपना सारा हाल मुफ़स्सल लिखो। इस लिफ़ाफ़े की रसीद और अपना सारा हाल मुफ़स्सल लिखो। इसमें तसाहुल न करो। बाबू साहिब के ख़त का जवाब अजमेर को रवाना कर दिया जाएगा। आपकी ख़ातिर जमा रहे। ज्यादा इससे क्या लिखूँ?
असदुल्ला


मुंशी ‍साहिब,
तु्म्हारा ख़त कल यानी बुध के दिन पहुँचा। मैं चार दिन से लर्जें में मुबतिला हूँ और मज़ा यह है कि जिस दिन से लर्जा चढ़ा है, खाना मुतलक़ मैंने नहीं खाया। आज पंच शंबा पांचवा दिन है कि न खाना दिन को मुयस्सर है और न रात को शराब। हरारत मिज़ाज में बहुत है, नाचार एहतिराज़ करता हूँ।
भाई, इस लुत्फ़ को देखो कि पाँचवाँ दिन है खाना खाए। हरगिज़ भूख नहीं लगी और तबियत ग़िज़ा की तरफ़ मुतवज्जेह नहीं हुई। बाबू साहिब वाला मनाकिब का ख़त तुम्हारे नाम का देखा, अब उस इरसाल में वह आसानी न रही और बंदा दुश्वारी से भागता है। क्यों तकलीफ़ करें? और अगर बहरहाल, उनकी मर्जी है तो ख़ैर, मैं फ़रमां पज़ीर हूँ। अशआ़र-ए-साबिक़ व हाल मेरे पास अमानत हैं। बाद अच्छे होने के उनको देखूँगा और तुमको भेज दूँगा। इतनी सतरें मुझसे ब-हज़ार ज़र्र-ए-सक़ील लिखी गई हैं।

2 मार्च 1854 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-8

अजब तमाशा है। बाबू साहिब लिख चुके हैं कि हरदेव सिंह आ गया और पाँच सौ रुपए की हुंडी लाया। मगर उसके मसारिफ़ की बाबत उनतीस रुपए कई आने उस हुंडी में महसूब हो गए हैं। सौ मैं अपने पास से मिलाकर पूरे पाँच सौ की हुंडी तुझको भेजता हूँ। 

मैंने उनको लिखा कि मसारिफ़ हरदेवसिंह के मैं मुजरा दूँगा, तकलीफ़ न करो। '25' ये मेरी तरफ़ से हरदेवसिंह के और दे दो और बाक़ी कुछ कम साढ़े चार सौ की हुंडी जल्द रवाना करो। सो भाई, आज तक हुंडी नहीं आई।
मैं हैरान हूँ। वजह हैरानी की यह कि उस हुंडी के भरोसे पर क़र्ज़दारों से वायदा जून के अवायल का किया था। आज जून की पाँचवीं है। वह तक़ाजा़ करते हैं और मैं आज, कल कर रहा हूँ। शर्म के मारे बाबू साहिब को कुछ नहीं लिख सकता।
 
जानता हूँ कि वह सैकड़ा पूरा करने की फिक्र में होंगे। फिर वे क्यों इतना तकल्लुफ़ करें? तीस रुपए की कौन-सी ऐसी बात है? अगर मसारिफ़-ए-हरदेवसिंह मेरे हाँ से मुजरा हुए तो क्या ग़ज़ब हुआ? उनतीस और पच्चीस, चौवन रुपया निकाल डालें बाकी़ इरसाल करें।
लिफ़ाफे़ ख़तूत के जौ मैंने भेजे थे, वह भी अभी नहीं आए। बाईंहमांयह कैसी बात है कि मैं यह भी नहीं जानता कि बाबू साहिब कहाँ पर हैं, पहाड़ पर हैं, या भरतपुर आए हैं? अजमेर आने की तो ज़ाहिरा कोई वजह नहीं है। नाचार कसरत-ए-इंतज़ार से आजिज़ आकर आज तुमको लिखा है। तुम इसका जवाब मुझको लिखा। और अपनी राय लिखो कि वजह दिरंग की क्या है, ज्यादा-ज्यादा।

5 जून 1853 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-7

भाई,
हाँ मैंने 'जुब्बादातुलाख़बार' में देखा कि रानी साहिब मर गईं। कल एक दोस्त का ख़त अकबराबाद से आया। वह लिखता है कि राजा मरा, रानी नहीं मरी। अभी रियासत का कोई रंग ‍क़रार नहीं पाया। सूरत-ए-इंतज़ाम जानी बैजनाथ के आने पर मौकूफ़ है। यहाँ तक उस दोस्त की तहरीर है, ज़ाहिरा उसको बाबू साहिब का नाम नहीं मालूम। उनके भाई का नाम याद रह गया।
िर्फ उस दोस्त ने ब-तरीक-ए-अख़बार लिखा है। उसको मेरी और 'जानी की दोस्ती का भी हाल मालूम नहीं। हासिल इस तरहरीर से यह है कि अगर यह ख़बर सच है तो हमारे-तुम्हरे दोस्त का नाम बना रहेगा। आमीन, या रब्बुल आलमीन।

साहिब,जयपुर का मुक़द्दमा अब लायक़ इसके नहीं है कि हम उसका ख्याल करें। एक बिना डाली थी, वह न उठी। राजा लड़का है और छछोरा है। रावल जी और सादुल्ला खां बने रहते तो कोई सूरत निकल आती, और यह जो आप लिखते हैं कि राजा तेरे दीवान को पढ़ा करता है और पेश-ए-नजर रखता है। यह भी तो आप अज़ रू-ए-तहरीर-ए-मुंशी हरदेवसिंह कहते हैं। उन का बयान क्योंकर दिलनशीन हो?
वह भी जो बाबू साहिब लिख चुके हैं कि पाँच सौ रुपया नक़द और ख़लहत मिर्जा साहिब के वास्ते तज़वीज़ हो चुका है। होली हो चुकी और मैं लेकर चला, फागुन, चैत, बैसाख, नहीं मालूम होली किस महीने में होती है। आगे तो फागुन में होती थी।
बंदापरवर, बाबू साहिब ने पहली बार मुझको दो हुंडियाँ भेजी हैं, सौ-सौ रुपए की। एक तो मीर अहमद हुसैन मैकश के वास्ते राजा साहिब की तरफ से तारीख़-ए-तव्वुलुद-ए-कंवर साहिब के इनाम में और एक अपनी तरफ़ से मुझको बत़कीर-ए-नजर-ए-शागिर्दी। बाद उसके दो हुंडिया सौ-सौ रुपए की बाद चार-चार,पाँच-पाँच महीने के आईं। मअ़ मीर अहमद हुसैन के सिले के रुपयों के चार सौ और उसके अलावा तीन सौ, और यह कि चार सौ या तीन सौ कितने दिन में आए इनका हिसाब कंवर साहिब की उमर पर हवाला है।
 
अगर वह दो बरस के हैं तो दो बरस में और अगर वह तीन बरस के हैं तो तीन बरस में। हाँ साहिब यह वही मीर क़ासिम अली साहिब हैं जो मेरे पुराने दोस्त हैं। परसों या अतरसों जो डाक का हरकारा तुम्हारा ख़त लाया था, वह एक ख़त मीर साहिब के नाम का, कोई मियां हिकमतउल्ला हैं उनका, मेरे मकान के पते से लाया था, वह मैंने लेकर रख लिया है। जब मीर साहिब आ जावें तो तुम उनको मेरा सलाम कहना और कहना कि हज़रत अगर मेरे वास्ते नहीं तो इस ख़त के वास्ते आप दिल्ली आइए।
 
 भाई, तुमने मुझे कौन-सा दो चार सौ रुपए का नौकर या पेंशनदार क़रार दिया है, जो दस-बीस रुपया ‍महीना किस्त आरजू रखते हो। तुम्हारी बातों पर कभी-कभी हँसी आती है। अगर तुम दिल्ली के डिप्टी कलेक्टर या वकील-ए-कंपनी होते, तो मुझको बड़ी मुश्किल पड़ती। बहरहाल, खुश रहो और मुतफ़क्किर न हो। पाँच रुपया महीना पेंशन अँग्रेजी में से किस्त मुक़र्रर हो गया ता अदाए ज़र। इब्तदाए जून सन् 1853 ई. यानी माहे आइंदा से यह किस्त जारी होगी।
बाबू साहिब का ख़त तुम्हारे नाम का पहुँचा। अजब तमाशा है। वह दिरंग के होने से ख़जिल होते हैं और मैं उनके उज्र चाहने से मरा जाता हूँ। ऐ इत्तिफाक़ आज मैंने उनको लिखा और कल राजा के मरने की ख़बर सुनी। वल्लाह बिल्लाह। अगर दो दिन पहले ख़बर सुन लेता तो अगर मेरी जान पर आ बनती, तो भी उनको न लिखता। जयपुर के आए हुए रुपए की हुंडी इस वक्त तक नहीं आई। शायद आज शाम तक या कल तक आ जावे।
खुदा करे वे आबू पहाड़ पर से हुंडी रवाना कर दें, वरना फिर ख़ुदा जाने, कहाँ-कहाँ जाएँगे और रुपया भेजने में कितनी देर हो जाएगी। ख़ुदा करे, जर्र-ए-मसारिफ़ हरदेवसिंह उसी में से मुजरा लें, मेरी कमाल ख़ुशी है और यह न हो तो '25' हरदेवसिंह को मेरी तरफ़ से ज़रूर दें। मुंशी साहिब का एक ख़त हाथरस से आया था। कल उसका जवाब हाथरस को रवाना कर चुका हूँ।

2 मई 1853 ई.

ग़ालिब का ख़त-6

आज मंगल के दिन पाँचवीं अप्रैल को तीन घड़ी दिन रहे डाक का हरकारा आया। एक ख़त मुंशी साहिब का और एक ख़त तुम्हारा और एक ख़त बाबू साहिब का लाया। 
बाबू साहिब के ख़त से और मतालिब तो मालूम हो गए, मगर एक अम्र में मैं हैरान हूँ कि क्या करूँ! यानी उन्होंने एक ख़त किसी शख्स का आया हुआ मेरे पास भेजा है और मुझको यह लिखा है कि उसको उल्टा मेरे पास भेज देना। हालाँकि खुद लिखते हैं कि मैं अप्रैल की चौथी को सपाटु या आबू जाऊँगा और आज पाँचवीं है। बस तो वह कल रवाना हो गए, अब मैं वह ख़त किसके पास भेजूँ? नाचार तुमको लिखता हूँ कि मैं ख़त को अपने पास रहने दूँगा।
जब वे आकर मुझको अपने आने की इत्तिला देंगे, तब वह ख़त उनको भेजूँगा। तुमको तरद्‍दुद न हो कि क्या ख़त है। ख़त नहीं, मेंढोलाल कायथ ग़म्माज़ की अर्जी थी बनाम महाराजा बैकुंठबासी, शिकायत-ए-बाबू साहिब पर मुश्तमल कि उसने लिखा था कि हरदेव सिंह जानी जी का दीवान और एक शायर दिल्ली का दीवान महाराज जयपुर
के पास लाया है और इसके भेजने की यह वजह है कि पहले उनके लिखने से मुझको मालूम ह‍ुआ था कि किसी ने ऐसा कहा है।
मैंने उनको लिखा था कि तुमको मेरे सर की क़सम, अब हरदेवसिंह को बुलवा लो। मैं अम्र-ए-जुज्बी के वास्ते अम्र-ए-कुल्ली का बिगाड़ नहीं चाहता। उसके जवाब में उन्होंने वह अर्जी भेजी और लिख भेजा कि राजा मरने वाला ऐसा न था कि इन बातों पर निगाह करता। उसने यह अर्जी गुजरते ही मेरे पास भेज दी थी। फ़कत-बारे, इस ख़त के आने से जानी जी की तरफ से मेरी ख़ातिर जमा हो गई।
मगर अपनी फिक्र पड़ी, यानी बाबू साहिब आबू होंगे। अगर हरदेवसिंह फिरकर आएगा तो वह बग़ैर उनके मिले और उके कहे मुझ तक काहे को आएगा। खै़र वह भी लिखता है कि रावल कहीं गया हुआ है, उसके आए पर रुख्सत होगी। देखिए वह कब आवे और क्या फर्ज है कि उसके आते ही रुख्सत हो भी जाए। तुम्हारी ग़ज़ल पहुँची। यह अलबत्ता कुछ देर से पहुँचेगी हमारे पास। घबराना नहीं।

6
अप्रैल सन् 1853 ई. असदुल्ला

ग़ालिब का ख़त-5

भाई,
आज मुझको बड़ी तशवीश है। और यह खत मैं तुमको कमाल सरासीमगी में लिखता हूँ। जिस दिन मेरा ख़त पहुँचे, अगर वक्त डाक का हो, तो उसी वक्त जवाब लिखकर रवाना करो और अगर वक्त न रहा हो, तो नाचार दूसरे दिन जवाब भेजो। मंशा तशवीश-व-इज्तिराब का यह है कि कई दिन से राजा भरतपुर की बीमारी की खबर सुनी जाती थी कल से और बुरी खबर शहर में मशहूर है। तुमभरतपुर से क़रीब हो। यकीन है कि तुमको तहक़ीक़ हाल मालूम होगा। जल्द लिखो कि क्या सूरत है?
राजा का मुझको ग़म नहीं, मुझको फिक्र जानी जी की है कि उसी इलाके में तुम भी शामिल हो। साहिबान अंग्रेज़ ने रियासतों के बाब में एक कानून वज़ह किया है, यानी जो रईस मर जाता है, सरकार उस रियायत पर क़ाबिज व मुतसरिफ़ होकर रईसज़ादे के बालिग़ होने तक बंदोबस्त रियासत का अपने तौर पर रखती है। सरकारी बंदोबस्त में कोई क़दीम-उल-ख़िदमत मौकूफ़ नहीं होता।
इस सूरत में यकीन है कि जानी साहिब का इलाक़ा बदस्तूर क़ायम रहे। मगर यह वकील हैं, मालूम नहीं मुख्तार कौन है और हमारे बाबू साहिब में और उस मुख्तार में सोहबत कैसी है, रानी से इनकी क्या सूरत है। तुम अगर्चे बाबू साहिब की मुहब्बत का इलाका रखते हो, लेकिन उन्होंने अज राह दूरंदेशी तुमको मुतवस्सिल उस सरकार का कर रखा है और तुम मुस्तग़नियाना और लाउबालियाना जिंदगी बसर करते थे। निहार अब वह रविश न रखना। अब तुमको भी लाज़िम आ पड़ा है जानीजी के साथ रूशनास-ए-हुक्कामवाला मक़ाम होना है।
पस चाहिए कोल की आरामिश का तर्क करना और ख़ाही नख़ाही बाबू साहिब के हमराह रहना। मेरी राय में यूँ आया है-और मैं नहीं लिख सकता कि मौक़ा क्या है और मसलहत क्या है। जानी जी भरतपुर आए हैं या अजमेर में हैं, किस फिक्र में हैं और क्या कर रहे हैं? वास्ते खुदा के न मुख्तसर, न सरसरी, बल्कि मुफस्सल और मुक़फ्फा जो वाकै हुआ हो और जो सूरत हो, मुझको लिखो और जल्द लिखो कि मुझ पर ख़ाब-ओ खुर हराम है।
कल शाम को मैंने सुना, आज सुबह किले नहीं गया और यह ख‍त लिखकर अज़ राह-ए-एहतियात बैरंग रवाना किया है। तुम भी इसका जवाब बैरंग रवाना करना। आध आना ऐसी बड़ी चीज़ नहीं। डाक के लोग बैरंग खत को जरूरी समझकर जल्द पहुँचाते हैं और पोस्टपेड पड़ा रहता है। जब उस मुहल्ले में जाना होता है तो उसको भी ले जाते हैं। ज्यादा क्या लिखूँ कि परेशान हूँ।

28
मार्च सन् 1853 ई.