Saturday, May 25, 2013

ओ हर सुबह जगाने वाले ओ हर शाम सुलाने वाले.. Gopaldas Neeraj

ओ हर सुबह जगाने वाले, ओ हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना जग में, तो फिर मुझे नयन मत देता

जिस दरवाज़े गया ,मिले बैठे अभाव, कुछ बने भिखारी
पतझर के घर, गिरवी थी ,मन जो भी मोह गई फुलावारी
कोई था बदहाल धूप में, कोई था गमगीन छाँवों में 
महलों से कुटियों तक थी सुख की दुःख से रिश्तेदारी
ओ हर खेल खिलाने वाले , ओ हर रस रचाने वाले
घुने खिलौने थे जो तेरे, गुड़ियों को बचपन मत देता

गीले सब रुमाल अश्रु की पनहारिन हर एक डगर थी
शबनम की बूंदों तक पर निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
निरवंशी थे स्वपन दर्द से मुक्त न था कोई भी आँचल
कुछ के चोट लगी थी बाहर कुछ के चोट लगी भीतर थी
ओ बरसात बुलाने वाले ओ बादल बरसाने वाले 
आंसू इतने प्यारे थे तो मौसम को सावन मत देता

भूख़ फलती थी यूँ गलियों में , ज्यों फले यौवन कनेर का
बीच ज़िन्दगी और मौत के फासला था बस एक मुंडेर का
मजबूरी इस कदर की बहारों में गाने वाली बुलबुल को
दो दानो के लिए करना पड़ता था कीर्तन कुल्लेर का 
ओ हर पलना झुलाने वाले ओ हर पलंग बिछाने वाले 
सोना इतना मुश्किल था, तो सुख के लाख सपन मत देता

यूँ चलती थी हाट की बिकते फूल , दाम पाते थे माली
दीपों से ज्यादा अमीर थी , उंगली दीप बुझाने वाली 
और यहीं तक नहीं , आड़ लेके सोने के सिहांसन की
पूनम को बदचलन बताती थी अमावास की रजनी काली 
ओ हर बाग़ लगाने वाले ओ हर नीड़ लगाने वाले 
इतना था अन्याय जो जग में तो फिर मुझे विनम्र वचन मत देता

क्या अजीब प्यास की अपनी उमर पी रहा था हर प्याला 
जीने की कोशिश में मरता जाता था हर जीने वाला
कहने को सब थे सम्बन्धी , लेकिन आंधी के थे पते
जब तक परिचित हो आपस में , मुरझा जाती थी हर माला
ओ हर चित्र बनने वाले, ओ हर रास रचाने वाले
झूठे थी जो तस्वीरें तो यौवन को दर्पण मत देता 

ओ हर सुबह जगाने वाले ओ हर शाम सुलाने वाले
दुःख रचना था इतना जग में तो फिर मुझे नयन मत देता..

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए.. Gopaldas Neeraj

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए

फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

दिल जवां, सपने जवाँ, मौसम जवाँ, शब् भी जवाँ
तुझको मुझसे इस समय सूने में मिलना चाहिए.. 

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला.. Gopaldas Neeraj

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला,
मेरे स्वागत को हर एक जेब से खंजर निकला ।

तितलियों फूलों का लगता था जहाँ पर मेला,
प्यार का गाँव वो बारूद का दफ़्तर निकला ।

डूब कर जिसमे उबर पाया न मैं जीवन भर, 
एक आँसू का वो कतरा तो समुंदर निकला ।

मेरे होठों पे दुआ उसकी जुबाँ पे ग़ाली,
जिसके अन्दर जो छुपा था वही बाहर निकला ।

ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा,
मेरा सब रूप वो मिट्टी की धरोहर निकला ।

वो तेरे द्वार पे हर रोज़ ही आया लेकिन,
नींद टूटी तेरी जब हाथ से अवसर निकला ।

रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिसने खाई,
वो भिखारी तो शहंशाहों से बढ़ कर निकला ।

क्या अजब है इंसान का दिल भी 'नीरज'
मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला 

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे .. Gopaldas Neeraj

हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे । 
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे ।

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल, 
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे ।

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी, न बिरहमन, न वो शेख, 
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे । 

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ, 
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे । 

चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख, 
देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुँचे ।

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ...Gopaldas Neeraj

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा । 
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में, 
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा । 

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में, 
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा । 

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की, 
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा । 

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में, 
उसे कुछ भी न मिला जो अगर-मगर में रहा ।




Sunday, May 19, 2013


तूने पूछा है मगर कैसे बताएं तुझ को 
दुःख इबारत तो नहीं कि तुझे लिख भेजें .. अज्ञात 
खिड़की चाँद किताब और मैं
मुद्दत से इक बाब और मैं 
शब् भर खेलें आपस में 
दो ऑंखें इक ख़ाब और मैं 
मौज और कश्ती साहिल पर 
दरिया में गर्दाब और मैं 
शाम , उदासी, ख़ामोशी 
कुछ कंकर तालाब और मैं ..
हर शब् पकड़े जाते हैं 
गहरी नींद, तेरे ख़ाब और मैं ...फ़ैसल 
*बाब- सागर , शब्- रात , गर्दाब-लहरें 
ਸੁੱਕੇ ਖੋਖਲਿਆਂ ਰੁੱਖਾਂ ਵਿੱਚ 
ਬੰਦ ਨੇ ਲੋਕ ਹਵਾਂਵਾਂ ਵਰਗੇ
ਆਪਣੀ ਹੋਂਦ ਗੁਆ ਬੈਠੇ ਨੇ
ਬੁਢੜੇ ਦੀਆਂ ਜੜਾਵਾਂ ਵਰਗੇ 
ਅੱਧ ਮਰਿਆਂ ਸਿਰ ਠੂੰਗੇ ਮਾਰਨ
ਲੋਕ ਕਾਲਿਆਂ ਕਾਂਵਾਂ ਵਰਗੇ
ਪਰੀ ਫਰਿਸ਼ਤੇ ਸਾਰੇ ਮਰਗੇ
ਬਾਂਝ ਕੁੜੀ ਦੇ ਚਾਂਵਾਂ ਵਰਗੇ.. 'Raj Singh
ਤੂੰ ਜਦੋਂ ਬਹੁਤ ਸੱਚਾ ਜਿਹਾ ਹੋ ਜਾਨੈਂ
ਸ਼ੁੱਧ ਬੋਲਣ ਲਗ ਜਾਨੈਂ, ਫ਼ਿਕਰੇ ਘੜ ਘੜ ਕੇ
ਸਿਹਾਰੀਆਂ ਬਿਹਾਰੀਆਂ, ਵਿਰਾਮ ਚਿੰਨ੍ਹ ਲਾ ਕੇ
ਮੈਂ ਡਰ ਜਾਂਦੀ ਹਾਂ
ਓਦੋਂ ਮੇਰਾ ਜੀਅ ਕਰਦੈ
ਤੇਰੇ ਚਿਹਰੇ ਤੇ ਥੁਹੜੀ ਜਿਹੀ
ਮਿੱਟੀ ਮਲ ਦਿਆਂ
ਨਛੁਹ ਲੀੜਿਆਂ ਤੇ ਛਿੱਟੇ ਪਾ ਦਿਆਂ
ਤੇ ਤੈਨੂੰ ਕਿਤਾਬੀ ਜਿਹੇ ਨੂੰ
ਅਸਲੀ ਬਣਾ ਲਵਾਂ... Navtej Bharati
जब भी अंजाम-ए-मुहब्बत ने पुकारा ख़ुद को,
वक़्त ने पेश किया हम को मिसालों की तरह ... अज्ञात